एआई से डरने की जरूरत नहीं, वह सिर्फ एक औजार, उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद में बोले विष्णु प्रकाश त्रिपाठी


धीरज गोमे, नईदुनिया, उज्जैन : उज्जैन में शुक्रवार को युवा धर्म संसद में ‘एआई से डरने की आवश्यकता नहीं, वह सिर्फ एक औजार है’ का सनातन विचार प्रमुखता से गूंजा। मंच से उद्बोधन देते दैनिक जागरण समूह के कार्यकारी संपादक विष्णु प्रकाश त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि एआई नाम के इस कथित भूत से वहीं लोग भयाक्रांत है, जिन्हें अपने विवेक, धर्मानुमोदित ज्ञान और मौलिक सोच पर विश्वास नहीं है।

उन्होंने कहा कि तकनीक चाहे कितनी भी अत्याधुनिक क्यों न हो जाए, वह इंसानी चेतना, आत्म सत्य और धर्म संवेदनाओं का स्थान कभी नहीं ले सकती। जब व्यक्ति आत्महीनता का शिकार होता है, तब निरंकुशता हावी होती है। वे युवा धर्म संसद के उद्घाटन सत्र के बाद ‘निरंकुश संवाद पद्धति तथा सूचना एवं विचार का संघर्ष’ विषय पर युवाओं से संवाद कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि सूचना और समाचार एक उत्पाद (प्रोडक्ट) की तरह हैं और पाठक या दर्शक उसके उपभोक्ता हैं। किसी विचार को कितना ग्रहण करना है, यह उपभोक्ता के अपने विवेक का निर्णय है। यदि कोई टीवी चैनल या डिजिटल माध्यम समय व्यर्थ कर रहा हो अथवा समाज में भ्रम फैला रहा हो, तो उसे तुरंत ”स्विच आफ” कर देना चाहिए। यही सबसे बड़ा नियंत्रण है।

विषय पर आध्यात्मिक गुरु पुंडरिक गोस्वामी, मां सद्विद्यानंद, भारतीय प्रबंध संस्थान के निदेशक हिमांशु राय और प्रज्ञा प्रवाह के जे. नंदकुमार ने भी युवाओं से संवाद किया। विपुल सिंह, हिमांशु राय सहित कई युवाओं द्वारा पूछे प्रश्नों के जवाब भी दिए। कार्यक्रम में सेवाज्ञा संस्थानम् के संरक्षक आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण महाराज सहित कई ख्यात हस्तियां और देशभर से आए 1200 से अधिक युवा शामिल थे।

विष्णु प्रकाश त्रिपाठी ने यह भी किया स्पष्ट

सूचना में सुगंध और भाव आवश्यक- : बिना भाव, विचार और संवेदना के सूचना देने वाला व्यक्ति केवल एक पोस्टमैन की तरह होता है। सूचना से नकारात्मकता की दुर्गंध हटाकर उसमें सही विचारों की सुगंध मिलाना ही सच्ची और जिम्मेदार पत्रकारिता है।

कछुए की निरंतरता से मिलेगी सिद्धि- : युवाओं को सफलता का महामंत्र देते हुए उन्होंने कछुए और खरगोश की प्रसिद्ध कथा का उदाहरण दिया। उन्होंने समझाया कि कछुए की जीत का कारण उसका आलस्यहीन होना और उसमें प्रमाद का न होना था। उसकी सफलता के पीछे निरंतरता (”चरैवेति चरैवेति”) का भाव था। उसी निरंतरता, वैचारिकता और अटूट संकल्प ने उसे अंततः विजय दिलाई।

युवा स्वयं रचें अपना विधान- : उन्होंने आह्वान किया कि जो मन से युवा हैं, वे कभी दूसरों के बनाए नियमों पर नहीं चलते, बल्कि अपने नियम और विधान स्वयं रचते हैं। युवाओं को इस राष्ट्र यज्ञ में समिधा की भांति अपना निस्वार्थ योगदान देना चाहिए। जीवन में निरंतर अध्ययन और वैचारिकता से ही एक सही दृष्टि, ध्येय और संकल्प का निर्माण होता है, जो देश और पूरे समाज को आगे ले जाने का कार्य करता है।

पुंडरीक गोस्वामी ने कहा- ‘सूचना गति मांगती है, विचार गहराई’

आध्यात्मिक गुरु पुंडरीक गोस्वामी जी ने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक अनुशासित कला और सनातन संस्कृति की आत्मा है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे धर्म को केवल परंपरा न मानकर उसकी वैज्ञानिकता, तार्किकता और जीवन मूल्यों को समझें। विषय पर कहा कि सूचना गति मांगती है, विचार गहराई। सूचना अधिक और विचार संयमित अच्छे लगते हैं।

आज की युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिकता को स्वीकार करना चाहिए। सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना ही व्यक्ति को सही और गलत का अंतर सिखाती है। जब युवा अपनी समृद्ध परंपरा और सनातन मूल्यों पर गर्व करते हैं, तभी एक सशक्त और स्वाभिमानी राष्ट्र का निर्माण संभव होता है। युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों में घबराने के बजाय अपने धर्मानुमोदित मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़ते रहना चाहिए। यदि युवा अपने भीतर विवेक, सेवा भाव और राष्ट्र-प्रथम का संकल्प धारण कर लें, तो विश्व पटल पर भारत की पहचान और अधिक सुदृढ़ होगी।

जे. नंदकुमार बोले- ‘संवाद में आत्म-नियंत्रण और सत्यनिष्ठा की आवश्यकता’

प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे. नंदकुमार ने सूचना के दौर में संवाद की मर्यादा, सत्यनिष्ठा और आत्म-नियंत्रण (सेल्फ-रेगुलेशन) पर बल दिया है। हाल ही में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि मीडिया और जनसंवाद का मूल उद्देश्य समाज को सत्य से अवगत कराना और तत्वबोध कराना होना चाहिए, न कि महज टीआरपी या तात्कालिक लाभ के लिए भ्रामक सूचनाएं (प्रवाद) फैलाना।

चीन भारतीय परंपरा और मनुस्मृति व वाक्यपदीयम जैसे ग्रंथों का संदर्भ देते हुए नंदकुमार ने कहा कि संवाद सर्व-समावेशी और विचारशील होना चाहिए। उन्होंने मीडिया में बढ़ती ”शूट एंड स्कूट” (खबर बनाकर तुरंत जिम्मेदारियों से भागना) की संस्कृति पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि कुछ तत्व प्रायोजित वीडियो व भ्रामक खबरों के ज़रिए समाज में विखंडन और असंतोष पैदा करने का प्रयास करते हैं।

संबोधन के अंत में उन्होंने रेखांकित किया कि मीडिया या सूचना क्षेत्र को नियंत्रित करने के लिए केवल सरकारी कानून पर्याप्त नहीं हैं, इसके लिए आंतरिक अनुशासन, आत्म-नियंत्रण और मूल्यों पर आधारित शिक्षा अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने युवाओं और संवादकर्ताओं से आग्रह किया कि वे सनसनीखेज सामग्री के बजाय तथ्यपरक और राष्ट्र-निर्माण में सहायक संवाद को प्राथमिकता दें।

मां सद्विद्यानंद ने बोलीं- ‘जीवन में सफलता के लिए स्वयं सही ”निश्चय” करना अति आवश्यक’

आध्यात्मिक गुरु मां सद्विद्यानंद ने कहा कि भगवद्गीता का सबसे बड़ा संदेश ही यही है कि मनुष्य दूसरों के भरोसे रहने के बजाय स्वयं सही ”निश्चय” करना सीखे। आध्यात्मिक गुरु मां सद्विद्यानंद ने मानव जीवन में विवेक, स्वावलंबन और स्वयं निर्णय लेने की क्षमता को सफलता की मुख्य कुंजी बताया है।

उन्होंने भगवद्गीता का संदर्भ देते हुए समझाया कि कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा था कि ”आप मेरे लिए एक मार्ग निश्चित कर दीजिए”। परंतु भगवान ने उस पर कोई बना-बनाया निर्णय नहीं थोपा, बल्कि उसे सम्यक ज्ञान प्रदान किया ताकि अर्जुन स्वयं अपने विवेक से धर्म युद्ध का निश्चय कर सके।

उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि आज की शिक्षा पद्धति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) मनुष्य को बौद्धिक रूप से पराश्रित बना रही है, जहां लोग अपनी मौलिक सोचने और निर्णय लेने की क्षमता खोते जा रहे हैं। मां सद्विद्यानंद ने स्पष्ट किया कि किसी से सलाह लेना या दूसरों के अनुभवों का उपयोग करना गलत नहीं है, लेकिन अंततः निर्णय आपका अपना होना चाहिए। ईश्वर ने हर मनुष्य को जन्म से ही धर्म और अधर्म को पहचानने का विवेक दिया है। इसलिए जब तक आप स्वयं अपने निश्चय पर दृढ़ता से नहीं चलेंगे, तब तक जीवन में वास्तविक सिद्धि और प्रगति संभव नहीं है।

डिजिटल दौर में मशीन से नहीं, विवेक से तय होगी इंसान की शिक्षा: प्रो. हिमांशु राय

भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) इंदौर के निदेशक प्रोफेसर हिमांशु राय ने कहा कि आने वाले समय में सबसे शिक्षित व्यक्ति वह नहीं होगा जिसके पास सबसे अधिक सूचनाएं होंगी, क्योंकि सूचनाएं तो मशीनों के पास भी होंगी। सबसे शिक्षित व्यक्ति वह होगा जिसके पास यह निर्णय लेने का विवेक होगा कि किस सूचना पर विश्वास करना है और किस पर नहीं।

”युवा” की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए कहा कि युवा केवल आयु का परिचायक नहीं है, बल्कि युवा वह है जिसके भीतर प्रश्न करने का साहस है। जिसके अंदर नए विचार को स्वीकार करने का खुलापन है और जो भविष्य जैसा मिला है, उसे वैसा ही स्वीकार करने के बजाय और बेहतर बनाने की आकांक्षा रखता है। उन्होंने कहा कि आज मतभेद समस्या नहीं है, बल्कि मनभेद असली समस्या है।

संवाद का अर्थ केवल अपनी बात कहना नहीं, बल्कि दूसरों के विचारों को सुनकर खुद को बदलने की क्षमता रखना भी है। युवाओं को अपनी सोच में खुलापन, वाणी में संयम, विमर्श में सम्मान और निर्णय में विवेक अपनाना चाहिए, ताकि सूचनाएं समाज को विभाजित करने के बजाय जोड़ने का काम करें।

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