युवा धर्म संसद में बोले मोहन भागवत
नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शुक्रवार को उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद का विधिवत उद्घाटन किया।
उन्होंने कहा कि धर्म भारत के जीवन का आधार है। धर्म हमारे डीएनए में है। यहां युवा धर्म पर चर्चा कर रहे हैं, इस बात की बहुत खुशी है। धर्म को रिलीजन (मजहब) से अलग बताते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि मजहब जहां किसी पंथ या मत से जोड़ता है, वहीं धर्म मनुष्य को कर्तव्य, सदाचार और परहित का मार्ग दिखाता है। धर्म मनुष्य को बांधता नहीं, बल्कि स्वार्थ और अहंकार से मुक्त कर मोक्ष की दिशा में ले जाता है।
पाश्चात्य संस्कृति धर्म को रिलीजन कहती है, जबकि भारत में धर्म का अर्थ धारण करना है। लोग मानते हैं कि धर्म केवल बूढ़ों के लिए है, लेकिन ऐसा नहीं है। जिस तरह अखाड़े में नियमित दंड-बैठक लगानी पड़ती है, उसी तरह धर्म को आचरण में लाने के लिए नियमित अभ्यास आवश्यक है। बता दें, युवा धर्म संसद में देशभर से करीब 1700 युवा भाग ले रहे हैं। उद्घाटन समारोह को आयोजक सेवाज्ञ संस्थानम् के संरक्षक आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण महाराज ने भी संबोधित किया।
डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि धर्म के कारण ही भारत ने कभी संकट में किसी का साथ छोड़ने का विचार नहीं किया। हमने कष्ट देने वालों की भी संकट के समय सहायता की। भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक और सामरिक दृष्टि से शक्तिशाली बनना नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को सुखी बनाना है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी में धर्म की भारतीय अवधारणा के लिए कोई सटीक शब्द नहीं है और पश्चिमी देशों के लोगों को इसे समझाने के लिए ‘रिलीजन’ शब्द का उपयोग किया गया है। जब रिलीजन को धर्म से अलग किया जाता है तो वह संकीर्ण या सांप्रदायिक हो सकता है। उन्होंने धर्म को सत्य, करुणा, पवित्रता और आत्म-अनुशासन पर आधारित बताया। युवाओं को धर्म के अनुसार चलकर भारत को ऐसा बनाना है, जिससे विश्व सुख-शांति की दिशा में आगे बढ़े।
धर्म के कारण शक्ति का सदुपयोग
डा. मोहन भागवत ने पाकिस्तान का नाम लिए बिना कहा कि एक देश बिना कारण द्वेष करता है और बार-बार तकलीफ देता है। हमने उसे कई बार सबक भी सिखाया लेकिन कभी यह नहीं कहा कि अलग होकर उपद्रव करते हो, हमारे साथ आ जाओ। हमने कहा कि अलग जीना है तो जियो। अलग-अलग विचारधाराओं की सरकारें आईं, लेकिन इस विषय पर सभी का रवैया एक जैसा रहा। भारत ने दुनिया के संघर्षों में बीच में पड़ने के बजाय सबको जोड़ने का प्रयास किया।
जीत तभी सार्थक, जब सबकी जीत हो
वैश्विक संघर्षों का उल्लेख करते हुए डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि युद्ध और झगड़े से पर्यावरण खराब होता है। पश्चिमी देशों ने शक्ति को ही जीवन का आधार माना, जबकि भारतीय परंपरा कहती है कि अपनी जीत तभी सार्थक है, जब उसमें सबकी जीत हो।
व्यवसाय का धर्म परहित और दान
उन्होंने कहा कि भारत 1600 वर्षों तक आर्थिक रूप से मजबूत रहा, लेकिन उस दौरान पर्यावरण और भूमि का ऐसा विनाश नहीं हुआ। पाश्चात्य अनुकरण के बाद गड़बड़ी बढ़ी। व्यवसाय का धर्म दान और समाजसेवा है। मनुष्य का कर्तव्य प्राणी और वनस्पति की रक्षा करना है। पर्यावरण को नष्ट करना अधर्म है।
धर्म को समझे बिना राय न बनाएं युवा : मिथिलेशनंदिनी शरण
आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण महाराज ने कहा कि धर्म अफीम की तरह काम करता है- यह कथन धर्म के लिए नहीं है। हमने दूसरे संदर्भ में कही गई बात को धर्म के माथे पर ओढ़ लिया है। भारतीय युवा इस कारण धर्म के प्रति विरुचि और भ्रांति का शिकार होता है। युवा किसी विषय पर राय बनाने से पहले उसकी परीक्षा करें। जब तक उसके प्रश्नों में वह स्वयं उपस्थित नहीं है, तब तक उत्तर उसके अपने नहीं हैं। युवा केवल सूचना और संदर्भों के आधार पर ही अपनी राय न बनाएं। आत्मबोध का सहारा लें। यदि युवा अपने देश-काल का नवीनतम संस्करण नहीं है तो यह चिंताजनक है।
उन्होंने कहा कि देश के युवा के लिए भारतीय युवा होना जरूरी है। युवा अपने निर्माण में अपने देश को पहचाने। हमारे जीवन में जिस तरह गुरुत्वाकर्षण काम करता है, उसी तरह हमारे होने में धर्म अपना कार्य करता है। यदि पृथ्वी और अंतरिक्ष अपने स्वभाव धर्म का तिलभर भी परित्याग कर दें तो वैज्ञानिकों की योजनाएं निरस्त हो जाएंगी। वायुयान केवल विज्ञानियों के बल से नहीं उड़ते, वे गुरुत्वाकर्षण, गति और प्रकृति के स्थिर नियमों के आधार पर चलते हैं। धर्म भी हमारे जीवन में उसी तरह काम करता है।
आस्तिकता और आचार तक सीमित कर दिया धर्म
मिथिलेशनंदिनी शरण ने कहा कि हम धर्म का अर्थ केवल आस्तिकता और आचार तक सीमित कर देते हैं। अलग-अलग देश-काल में उपजे द्वंद्व को धर्म के माथे पर लगा देते हैं। मजहब और रिलीजन में जो विकृतियां थीं, उन्हें हमने धर्म की विकृति मान लिया। इससे भारतीय युवा धर्म के प्रति विरुचि और भ्रांति का शिकार हो रहा है।
दूसरे दिन इन वक्ताओं ने किया संबोधित
युवा धर्म संसद के दूसरे दिन केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी, जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि महाराज, गीतकार मनोज मुंतशिर, अनादि फाउंडेशन की सहसंस्थापिका स्मृति अनंतलक्ष्मी, आचार्य पुंडरीक गोस्वामी महाराज, दैनिक जागरण-नईदुनिया समूह के कार्यकारी संपादक विष्णु प्रकाश त्रिपाठी और भारतीय प्रबंध संस्थान इंदौर के निदेशक प्रो. हिमांशु राय सहित अन्य ने संबोधित किया।
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