उज्जैन में संरक्षित 18 हजार से ज्यादा पांडुलिपियाें का हो रहा डिजिटलाइजेशन


सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय और सिंधिया प्राच्य विद्या शोध संस्थान में संरक्षित हजारों वर्ष पुरानी 18 हजार से अधिक पांडुलिपियों का डिजिटलाइजेशन क …और पढ़ें

Publish Date: Thu, 14 May 2026 12:50:13 PM (IST)Updated Date: Thu, 14 May 2026 12:50:13 PM (IST)

उज्जैन में संरक्षित 18 हजार से ज्यादा पांडुलिपियाें का हो रहा डिजिटलाइजेशन
पांडुलिपि का मूल रूप। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. हजारों वर्ष पुरानी 18 हजार से अधिक पांडुलिपियों का डिजिटलाइजेशन किया जा रहा है
  2. भोजपत्र और ताड़पत्र पर लिखित दुर्लभ ग्रंथों की हाई-डेफिनिशन स्कैनिंग कर इंटरनेट पर अपलोड की जा रही है
  3. यह आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारे गौरवशाली इतिहास की कड़ी हैं

नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। अवंतिका नगरी उज्जैन, जो युगों-युगों से ज्ञान और विज्ञान का केंद्र रही है, अब अपनी प्राचीन विरासत को आधुनिक तकनीक के साथ सहेजने की दिशा में एक बड़ी छलांग लगा रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर शुरू हुए ‘ज्ञान भारतम’ प्रकल्प के अंतर्गत उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय और सिंधिया प्राच्य विद्या शोध संस्थान में संरक्षित हजारों वर्ष पुरानी 18 हजार से अधिक पांडुलिपियों का डिजिटलाइजेशन किया जा रहा है। यानी भोजपत्र और ताड़पत्र पर लिखित दुर्लभ ग्रंथों की हाई-डेफिनिशन स्कैनिंग कर इंटरनेट पर अपलोड की जा रही है।

मालूम हो कि पांडुलिपि (मनुस्क्रीप्ट) वह दस्तावेज है, जो छापाखाने के आविष्कार से पहले ऋषियों, विद्वानों और वैज्ञानिकों द्वारा अपने हाथों से भोजपत्र, ताड़पत्र या हस्तनिर्मित कागजों पर लिखा गया था। इनमें भारत का प्राचीन खगोल विज्ञान, गणित, आयुर्वेद, योग, साहित्य, दर्शन, धार्मिक ग्रंथ और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं का अमूल्य ज्ञान संचित है। ये हमारी सभ्यता और विज्ञान के मौलिक आधार हैं। इनका संरक्षण इसलिए अनिवार्य है क्योंकि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारे गौरवशाली इतिहास की कड़ी हैं।

इन प्राचीन ग्रंथों में कई ऐसी वैज्ञानिक विधियां छिपी हैं, जो आधुनिक समस्याओं का समाधान दे सकती हैं। समय के साथ भोजपत्र और पुराने कागज खराब होने लगते हैं, डिजिटलीकरण इन्हें अनंत काल तक सुरक्षित कर देगा। उज्जैन में पांडुलिपियों का विशाल भंडार सिंधिया प्राच्य विद्या शोध संस्थान में स्थित है, जहां लगभग *20,000 दुर्लभ पांडुलिपियां* दशकों से सहेजी जा रही हैं। स्मार्ट सिटी सीईओ संदीप शिवा ने बताया कि भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा ज्ञान भारतम प्रकल्प के तहत सिंधिया संस्थान को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में विकसित किया गया है। वर्तमान में 18 से 20 हजार पांडुलिपियों के डिजिटल रूपांतरण की प्रक्रिया तेज कर दी गई है।

कलेक्टर की अपील- ‘ज्ञान भारतम’ ऐप पर करें अपलोड

कलेक्टर रौशन कुमार सिंह ने बताया कि मध्य प्रदेश पांडुलिपियों के पंजीकरण में देश में दूसरे स्थान पर है, जहां अब तक 10 लाख से अधिक पांडुलिपियां दर्ज की जा चुकी हैं। कलेक्टर ने नागरिकों से अपील की है कि यदि किसी परिवार या निजी संग्रह में कोई प्राचीन पांडुलिपि सुरक्षित है, तो उसे ‘ज्ञान भारतम’ ऐप पर अपलोड करें। उसे दान करना स्वैच्छिक है, लेकिन उसकी जानकारी साझा करना शोध और राष्ट्रहित में एक बड़ा योगदान होगा।



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