उज्जैन में करीब एक करोड़ रुपये की लागत से रजत मंडित हो रहा भगवान चिंतामन का गर्भगृह
ज्योतिर्लिंग महाकाल, शक्तिपीठ हरसिद्धि व कालभैरव के बाद चिंतामन गणेश धवल आभा से दमकने वाला शहर का चौथा मंदिर बन गया है। स्थानीय श्रद्धालु द्वारा गुप्त…और पढ़ें

HighLights
- महाकाल, कालभैरव व हरसिद्धि के बाद धवल आभा से दमकने वाला चौथा मंदिर बना
- स्थानीय श्रद्धालु द्वारा गुप्त दान के रूप में 35 किलो से अधिक चांदी से गर्भगृह को रजत मंडित करवाया जा रहा है
- चांदी की कीमत व स्वर्णकारों का मेहनताना मिलाकर इस कार्य में एक करोड़ रुपये से अधिक राशि खर्च होगी
नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। ज्योतिर्लिंग महाकाल, शक्तिपीठ हरसिद्धि व कालभैरव के बाद चिंतामन गणेश धवल आभा से दमकने वाला शहर का चौथा मंदिर बन गया है। स्थानीय श्रद्धालु द्वारा गुप्त दान के रूप में 35 किलो से अधिक चांदी से गर्भगृह को रजत मंडित करवाया जा रहा है। चांदी की कीमत व स्वर्णकारों का मेहनताना मिलाकर इस कार्य में एक करोड़ रुपये से अधिक राशि खर्च होगी।
मंदिर प्रशासक अभिषेक शर्मा ने बताया उज्जैन के भक्त ने गुप्त दान के रूप में मंदिर को रजत मंडित कराया है। दानदाता अपने स्वर्णकार से यह कार्य करा रहे हैं। करीब एक माह पहले उन्होंने मंदिर में आवेदन देकर गर्भगृह को रजत मंडित कराने का प्रस्ताव दिया था। इस पर आला अधिकारियों के माध्यम से उन्हें स्वीकृति प्रदान कर दी गई थी। दानदाता स्वयं अपनी निगरानी व देखरेख में शुद्ध चांदी से चांदी का वर्क करा रहे हैं। एक पखवाड़े से चल रहा काम एक दो दिन में पूर्ण हो जाएगा। इसके बाद दानदाता दान पत्र के माध्यम से मंदिर को गर्भगृह में लगी चांदी को बिल सहित मंदिर को सौंप देंगे।
भगवान राम, सीता, लक्ष्मण ने विराजित की मूर्ति
पं.शकर पुजारी ने बताया भगवान चिंतामन गणेश उज्जैन के षड्विनायक मंदिर में से एक है। मान्यता है वनवास के दौरान तीर्थपुरी अवंतिका आने पर भगवान श्रीराम, सीता व लक्ष्मणजी ने यहां विघ्नों के विनाश, चिंता से मुक्ति तथा मनोकामना पूर्ति के लिए भगवान चिंतामन, इच्छामन तथा सिद्धि विनायक की स्थापना की थी। देशभर से भक्त यहां आज भी भगवान के दर्शन करने आते हैं। इस मंदिर में एक प्राचीन लक्ष्मण बावड़ी भी है।
भोजकाल में बना, मराठा काल में जीर्णोद्धार हुआ
विक्रमादित्य विश्व विद्यालय के पुराविद डा.रमण सोलंकी ने बताया चिंतामन गणेश का मंदिर मालवा के भूरा बलुआ पत्थर से निर्मित है। इस प्रकार के पत्थर का उपयोग परमार राजा भोज के शासन काल में होता था। ऐसा प्रतीत होता है काल के अंतराल में आक्रांताओं ने इस मंदिर पर भी आक्रमण किया होगा और मंदिर को तहस नहस कर दिया होगा। क्योंकि मराठाकाल में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई द्वारा इस मंदिर के पुनर्निर्माण की बात सामने आती है। इस समय कारीगरों ने मंदिर के टूटे हुए अवशेषों को जोड़कर मंदिर को पुनर्निर्मित किया होगा, क्यों कि वर्तमान में स्तंभ व मंदिर के शिख का जो भाग हमें दिखाई देता है वह अलग-अलग खंड में बंटा हुआ है।