शिप्रा की आध्यात्मिक धारा का नया दस्तावेज तैयार, उज्जयिनी की सांस्कृतिक विरासत को मिलेगा नया आधार


धीरज गोमे, नईदुनिया, उज्जैन। देश की पवित्रतम नदियों में शुमार मोक्षदायिनी ‘शिप्रा नदी’ की आध्यात्मिक धारा का नया दस्तावेज (ग्रंथ) तैयार हुआ है। ये दस्तावेज ‘कालिदास संस्कृत अकादमी’ ने स्कन्द पुराण के संदर्भों, हिन्दी अनुवाद और दुर्लभ सामग्री के साथ ‘श्री शिप्रा महिमा’ और ‘शिप्रास्तोत्रम्’ नामक ग्रंथ के रूप में प्रकाशित किए हैं, जिसका उद्देश्य नई पीढ़ी को शिप्रा की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और पुराणिक महिमा से परिचित कराना है।

अकादमी के निदेशक डॉ. गोविन्द गंधे सहित शिक्षाविद् इसे उज्जयिनी की सांस्कृतिक पहचान और सनातन परंपरा के महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में देखे रहे हैं। उनका कहना है कि लंबे समय से शिप्रा नदी के महत्व पर प्रामाणिक और सरल भाषा में उपलब्ध साहित्य की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। इन दोनों पुस्तकों के प्रकाशन से अब शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों, धर्माचार्यों और आम श्रद्धालुओं को एक महत्वपूर्ण संदर्भ सामग्री उपलब्ध हो सकेगी।

शिप्रा भारतीय सांस्कृतिक की चेतना

डॉ. गन्धे ने ‘नईदुनिया’ को बताया कि स्कन्द पुराण के अवन्ती क्षेत्र महात्म्य में उज्जयिनी, यहां के देवालयों, जलतीर्थों और विशेष रूप से शिप्रा नदी का अत्यंत विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। शिप्रा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना, मोक्ष परंपरा और धार्मिक आस्था की जीवंत धारा है। इसके बावजूद आमजन तक शास्त्रीय जानकारी सहज रूप में उपलब्ध नहीं थी।

धार्मिक नगरी उज्जैन में सिंहस्थ 2028 की तैयारियों और शिप्रा संरक्षण को लेकर चल रही राष्ट्रीय चर्चा के बीच इन ग्रन्थों का प्रकाशन सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रयास शिप्रा नदी को केवल आस्था नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के वैश्विक प्रतीक के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी एक बड़ा कदम साबित होगा।

मराठी भाषा के ‘श्री शिप्रा नदी महात्म्य’ की सामग्री आधार

डॉ. गोविन्द गंधे ने बताया वर्ष 1940 में मार्तण्ड नारायण बर्डे द्वारा मराठी भाषा में ‘श्री शिप्रा नदी महात्म्य’ नामक एक लघु पुस्तिका प्रकाशित की गई थी, जो समय के साथ दुर्लभ और लगभग अनुपलब्ध हो चुकी है। इसी ऐतिहासिक सामग्री को आधार बनाकर ‘कालिदास संस्कृत अकादमी’ ने स्कन्द पुराण के मूल अंशों, संस्कृत श्लोकों और उनके हिन्दी अनुवाद के साथ इस नए ग्रन्थ का संपादन और प्रकाशन किया है।

पुस्तक में शिप्रा नदी की उत्पत्ति, धार्मिक महत्व, शिप्रा परिक्रमा, तीर्थ परंपरा और उज्जयिनी की आध्यात्मिक धारा का विस्तार से विवेचन किया गया है। विशेष बात यह है कि ‘शिप्र स्तोत्रम्’ में स्कन्द पुराण के आधार पर अत्यंत सरल और भावपूर्ण श्लोकों का संकलन किया गया है, ताकि सामान्य श्रद्धालु भी इसे सहजता से पढ़ और समझ सकें। इसके साथ दो ‘शिप्राष्टकम्’ भी प्रकाशित किए गए हैं, जो शिप्रा उपासना और स्तुति परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने का कार्य करेंगे।

यह भी जानिये

पुराणों में शिप्रा को ‘मोक्षदायिनी’ और ‘उत्तरवाहिनी पुण्यसलिला’ कहा गया है। लगभग 195 किमी लंबी शिप्रा का उद्गम इंदौर जिले की काकरी-बरड़ी पहाड़ियों से माना जाता है। कान्ह और गंभीर इसकी प्रमुख सहायक नदियां हैं। स्कन्द पुराण में इसकी उत्पत्ति भगवान विष्णु के रक्त एवं शिव कृपा से जुड़ी बताई गई है। महर्षि सांदीपनि की तपोभूमि और कालिदास की काव्य चेतना भी शिप्रा तट से ही अनुप्राणित मानी जाती है।

सिंहस्थ-2028 के दौरान एक समय में करोड़ों श्रद्धालुओं को शिप्रा नदी में सुलभता से स्नान कराने को घाट की लंबाई सरकार 9 किलोमीटर से बढ़ाकर 40 किलोमीटर कर रही है। घाट निर्माण कार्य तेजी से जारी है।

साथ ही शिप्रा में कान्ह का दूषित जल मिलने से रोकने के लिए कान्ह डायवर्शन क्लोज डक्ट परियोजना को भी तेजी से पूर्ण कराया जा रहा है। शिप्रा को शिप्रा के ही जल से सदानीरा रखने के लिए सेवरखेड़ी-सिलारखेड़ी बांध का काम भी तेजी से किया जा रहा है। ये तीनों परियोजना साल- 2027 में पूर्ण कराने का लक्ष्य है।



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