सिंहस्थ से पहले उज्जैन नगर निगम में स्थायी अधिकारियों को दरकिनार कर संविदा को सौंपे महत्वपूर्ण दायित्व


नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। उज्जैन नगर निगम में एक बार फिर महत्वपूर्ण, योजना और वित्तीय अधिकार वाले पद पर संविदा अधिकारी की नियुक्ति ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड के ‘संविदा कार्यपालन यंत्री पलाश शर्मा’ सहित दो सहायक यंत्रियों को प्रतिनियुक्ति पर नगर निगम के प्रकाश विभाग का कार्यपालन यंत्री बनाया गया है। यह नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब नगर निगम में स्थायी इंजीनियरों और सहायक यंत्रियों की उपलब्धता को लेकर किसी बड़े संकट की स्थिति सामने नहीं आई है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि सिंहस्थ से पहले आखिर स्थायी अधिकारियों को दरकिनार कर संविदा अधिकारी को महत्वपूर्ण दायित्व क्यों सौंपा गया।

नगर निगम के भीतर भी इस निर्णय को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। नेता-जनप्रतिनिधि और अफसर-कर्मचारियों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि यदि वास्तव में कार्यपालन यंत्री स्तर के अधिकारी की आवश्यकता थी तो शासन से नियमित तबादले के जरिए अधिकारी क्यों नहीं बुलाया गया।

उज्जैन में यह पहला मामला नहीं है

स्थायी व्यवस्था के बजाय संविदा अधिकारी पर भरोसा करने के पीछे क्या कारण हैं, इसे लेकर निगम प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट स्थिति सामने नहीं आई है। दरअसल, उज्जैन में यह पहला मामला नहीं है जब प्रभावशाली, नीतिगत और ‘वित्तीय अधिकार’ वाले पद संविदा अधिकारियों को सौंपे गए हो। इससे पहले सिंहस्थ से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी भी संविदा पर नियुक्त कार्यपालन यंत्री पीयूष भार्गव को दी गई थी।

करोड़ों रुपये के कार्यों की निगरानी, तकनीकी स्वीकृतियां और निर्णय लेने की प्रक्रिया लंबे समय तक संविदा अधिकारी के हाथों में रही। इसी तरह नगर निगम की लोक परिवहन कंपनी ‘उज्जैन सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज लिमिटेड’ (यूसीटीएसएल) का उदाहरण भी प्रशासनिक निर्णयों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यहां प्रबंधक जैसे महत्वपूर्ण पद पर हमेशा संविदाकर्मी की नियुक्ति रही।

संविदा अधिकारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देने की परंपरा नहीं रुकी

परिणाम यह हुआ कि सिटी बस सेवा लगातार अव्यवस्थित होती चली गई। बसें सालों तक आफ रोड पड़ी रहीं, भंगार हुई और यूसीटीएसएल करोड़ों रुपये के घाटे में पहुंच गया। इसके बावजूद संविदा अधिकारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देने की परंपरा नहीं रुकी। नेता प्रतिपक्ष रवि राय का ‘नईदुनिया’ से कहना है कि‘ निगम में 90 फीसद महत्वपूर्ण पदों पर संविदाकर्मी ही काम कर रहे। इंतहा ये है कि अब तो संविदा की बजाय आउटसोर्स कर्मचारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दे दी गई है।

सिंहस्थ के लिए लगना है करोड़ों की लाइट, इसी की मिली जिम्मेदारी

महाकुंभ सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के तहत करीब 350 किमी लंबे नए और चौड़े मार्गों पर 100 से अधिक चौराहों और घाट क्षेत्रों में करोड़ों रुपयें की विद्युत एवं एलईडी लाइट परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। ऐसे समय प्रकाश विभाग जैसे महत्वपूर्ण तकनीकी और वित्तीय अधिकार वाले पद पर स्थायी कार्यपालन यंत्री के बजाय संविदा कार्यपालन यंत्री को जिम्मेदारी देना प्रशासनिक और विधिक स्तर पर सवाल खड़े कर रहा है।

पलाश शर्मा वर्ष 2018 से उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड में सेवाएं दे रहे हैं। वे पहले संविदा सहायक यंत्री के रूप में नियुक्त हुए थे, बाद में उन्हें कार्यपालन यंत्री बनाया गया। स्मार्ट सिटी में पदस्थ इंजीनियरों की सेवा अवधि एक वर्ष की संविदा पर आधारित है, जिसका हर साल नवीनीकरण किया जाता है। शहर में 23 हजार से अधिक नगर निगम के खंभों पर एलईडी लाइट लगाने के बड़े टेंडर और उससे जुड़े कार्यों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन्हीं एलईडी लाइटों की गुणवत्ता, मेंटेनेंस खर्च और लागत को लेकर समय-समय पर शिकायतें सड़क से लेकर निगम सम्मेलन तक में गूंजी हैं। सूत्रों के अनुसार पलाश शर्मा स्मार्ट सिटी के साथ नगर निगम की जिम्मेदारी भी संभालेंगे, जबकि वेतन स्मार्ट सिटी लिमिटेड से ही प्राप्त करेंगे।

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