उज्जैन-आगर नैरोगेज की कहानी सुना रहा है 111 साल पुराना इंजन, 68 किमी की पटरी पर दौड़ती थी ट्रेन
अमित अतलसिया, नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। आज की तेज रफ्तार ट्रेनों के दौर में उज्जैन से आगर के बीच कभी ऐसी ट्रेन दौड़ती थी, जिसकी रफ्तार इतनी धीमी थी कि लोग दौड़कर उसमें सवार हो जाते थे और चलती ट्रेन से उतर भी जाते थे।
सात डिब्बों वाली यह ट्रेन उज्जैन से आगर की करीब 68 किलोमीटर की दूरी तय करने में चार घंटे से अधिक समय लेती थी। इस नैरोगेज ट्रेन की पहचान उज्जैन के मकोडियाआम स्टेशन से भी जुड़ी थी। स्टेशन के नाम पर ही इस मार्ग पर चलने वाले भाप इंजन को ‘मकोडियाआम’ नाम दिया गया था।
आज मकोडियाआम स्टेशन और उस दौर की नैरोगेज ट्रेन इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन उस समय का 564 नंबर भाप इंजन वर्तमान में रतलाम स्टेशन के बाहर संरक्षित है। वर्ष 1915 में निर्मित यह इंजन करीब 59 साल तक रेलवे की सेवा में रहा और वर्ष 1974 में सेवा से बाहर हुआ। इसके अंतिम कार्यक्षेत्र के रूप में उज्जैन-आगर नैरोगेज खंड का उल्लेख मिलता है।
68 किलोमीटर की पटरी पर बदल गई थी मालवा की रफ्तार
ग्वालियर स्टेट द्वारा 15 मार्च 1932 को उज्जैन से आगर के बीच नैरोगेज रेल सुविधा शुरू की गई थी। करीब 68 किलोमीटर लंबे इस मार्ग पर मकोडियाआम प्रमुख स्टेशन था। आगर रोड की ओर स्थित इस स्टेशन की पहचान बाद में इस रेलखंड की यादों से गहराई से जुड़ गई।
उस समय ट्रेन में एक भाप इंजन और सात डिब्बे होते थे। ट्रेन की रफ्तार बेहद कम थी। यही वजह थी कि ग्रामीण क्षेत्रों में इसके धीमे चलने को लेकर कई किस्से-कहानियां प्रचलित थीं। लोग कई बार दौड़कर चलती ट्रेन में चढ़ जाते थे। इसी तरह रास्ते में जरूरत के अनुसार चलती ट्रेन से उतर भी जाते थे।
भाप की सीटी के साथ शुरू होता था सफर
भाप इंजन के चलने से पहले सीटी की आवाज सुनाई देती थी। इंजन से निकलता धुआं और पटरियों पर धीमी गति से आगे बढ़ती ट्रेन उस दौर के मालवा के रेल जीवन का हिस्सा थी। नैरोगेज लाइन का उपयोग केवल यात्रियों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं था, बल्कि इससे आसपास के क्षेत्रों को उज्जैन जैसे बड़े व्यापारिक और धार्मिक केंद्र से जोड़ने में मदद मिली। जिन इलाकों में सड़क परिवहन सीमित था, वहां यह रेल लोगों की आवाजाही का प्रमुख साधन थी।
1915 में बना इंजन, 59 साल तक दौड़ा
इस रेलखंड की सबसे खास निशानियों में 564 नंबर का भाप इंजन भी शामिल है। वर्ष 1915 में निर्मित यह इंजन 2 फीट नैरोगेज ट्रैक पर चलने के लिए बनाया गया था। करीब 59 साल तक सेवा देने के बाद वर्ष 1974 में इसे रेलवे सेवा से बाहर कर दिया गया। इसके विवरण में अंतिम कार्यक्षेत्र उज्जैन-आगर दर्ज है।
इंजन पर लगे विवरण के अनुसार इसकी पहियों की व्यवस्था 2-6-2, बॉयलर का दबाव 175 पाउंड प्रति वर्ग इंच और कर्षण बल 6864 पाउंड था। इंजन का वजन करीब 27 टन और टेंडर का वजन 14.5 टन था। टेंडर में करीब 1000 गैलन पानी रखने की क्षमता थी।
आज यह इंजन रतलाम स्टेशन के बाहर खड़ा है। कभी पटरियों पर भाप और धुएं के साथ दौड़ने वाला यह इंजन अब नई पीढ़ी को रेलवे के उस दौर की कहानी बताता है, जब ट्रेन की रफ्तार से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका किसी इलाके तक पहुंचना था।
1975 में बंद हुई नैरोगेज लाइन
उज्जैन-आगर नैरोगेज रेल सेवा कई दशकों तक लोगों की आवाजाही का माध्यम रही। वर्ष 1975 में आपातकाल के दौरान इस रेल लाइन को बंद कर दिया गया। इसके साथ ही इस मार्ग पर भाप इंजन की सीटी और नैरोगेज ट्रेन की आवाज भी इतिहास में दर्ज हो गई।
आज उज्जैन-आगर मार्ग पर इस पुरानी रेल लाइन के कुछ अवशेष दिखाई देते हैं। कहीं पुराने रेलमार्ग की निशानी नजर आती है तो कहीं स्थानीय लोगों की स्मृतियों में मकोडियाआम स्टेशन और धीमी रफ्तार वाली ट्रेन अब भी जिंदा है।