उज्जैन में सीवरेज चैंबर की सफाई के दौरान एक की मौत, कई सवाल और खतरे में पूरा शहर
उज्जैन के पिपलीनाका में सीवरेज चैंबर की सफाई के दौरान टाटा प्रोजेक्ट प्राइवेट लिमिटेड के कर्मचारी अशोक की मौत हो गई और दो अन्य घायल हुए।

HighLights
- हादसे ने नगर निगम और कंपनी की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं
- निगम ने कंपनी के खिलाफ जीवाजीगंज थाने में एफआईआर के निर्देश दिए
- मृतक के परिजनों को 30 लाख रुपये की सहायता देने की घोषणा की
नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। पिपलीनाका में सीवरेज चैंबर की सफाई के दौरान टाटा प्रोजेक्ट प्राइवेट लिमिटेड के कर्मचारी अशोक की मौत और दो अन्य कर्मचारियों के घायल होने की घटना ने शहर की सुरक्षा व्यवस्था की परतें उधेड़ दी हैं।
नगर निगम ने कंपनी के खिलाफ जीवाजीगंज थाने में प्राथमिक सूचना दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं और मृतक के परिजनों को 30 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है, लेकिन इस हादसे ने कुछ ऐसे सवाल खड़े किए हैं, जिनके जवाब पूरे शहर को चाहिए।
सवाल-1 : सुरक्षा इंतजाम थे तो हादसा कैसे हुआ
निगम का कहना है कि चैंबर सफाई के लिए कंपनी ने क्लीनिंग मशीन और कर्मचारियों को लगाया था। सफाई के दौरान एक कर्मचारी का पैर फिसल गया और उसे बचाने के प्रयास में दो अन्य कर्मचारी भी चैंबर में उतर गए। सवाल यह है कि यदि चैंबर की सफाई हो रही थी तो क्या गैस डिटेक्शन किया गया था। क्या कर्मचारियों के पास ऑक्सीजन मास्क, सेफ्टी बेल्ट और अन्य सुरक्षा उपकरण थे? यदि नहीं, तो यह सीधे-सीधे सुरक्षा प्रोटोकाल की अनदेखी है।
सवाल-2 : रेस्क्यू सिस्टम मौके पर क्यों नहीं दिखा
तीनों कर्मचारियों को तत्काल बाहर निकालने के लिए राहत कार्य शुरू किया गया, लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मौके पर प्रारंभिक अफरा-तफरी का माहौल था। यदि संयोगवश पुलिस अधीक्षक प्रदीप शर्मा वहां से नहीं गुजरते और तत्काल पुलिस बल नहीं पहुंचता, तो स्थिति और गंभीर हो सकती थी। इससे सवाल उठता है कि क्या एजेंसी के पास प्रशिक्षित आपदा-प्रबंधन और रेस्क्यू टीम थी।
सवाल-3 : शहर में कितने खतरे इंतजार कर रहे हैं
पिपलीनाका का हादसा अकेली घटना नहीं है। बरसात शुरू होते ही शहर में कई खुले और खतरनाक गैस से भरे जाम हो चुके चैंबर पानी में छिप जाते हैं। कई सड़कें धंसाव और गड्ढों से प्रभावित हैं। नगर निगम ने वर्षों से जर्जर भवनों की सूची तैयार कर रखी है, लेकिन कई भवन अब भी कार्रवाई की प्रतीक्षा में हैं। खतरे मौजूद हैं, लेकिन समाधान की रफ्तार धीमी है।
उज्जैन शहर में चार बड़े खतरे
- बरसात में पानी में छिपे खुले चैंबर
- धंसी और गड्ढों से भरी सड़कें
- कार्रवाई की प्रतीक्षा में जर्जर भवन
- खुले बिजली तार और जलभराव वाले क्षेत्र