1 अप्रैल की डेडलाइन फेल, उज्जैन–जावरा हाईवे का काम टला; 61 गांवों की जमीन का अधिग्रहण मुआवजे की वजह से अटका


नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। मध्य प्रदेश की सबसे महत्वाकांक्षी सड़क परियोजनाओं में से एक, 98.41 किलोमीटर लंबा उज्जैन-जावरा ग्रीनफील्ड एक्सेस कंट्रोल्ड हाईवे, वर्तमान में कागजी दावों और धरातल की चुनौतियों के बीच झूल रहा है।

संभागायुक्त आशीष सिंह के 1 अप्रैल से काम शुरू करने के सख्त निर्देशों के बावजूद, प्रशासनिक सुस्ती और भूमि अधिग्रहण की कछुआ चाल ने इस लक्ष्य को लगभग नामुमकिन बना दिया है। प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी बाधा भूमि अधिग्रहण है।

करीब 98.41 किलोमीटर लंबे इस हाईवे के लिए उज्जैन जिले के 49 और रतलाम जिले के 12 गांवों की लगभग 430 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित की जानी है। तय समयसीमा के अनुसार 30 अक्टूबर 2025 तक किसानों को मुआवजा वितरित हो जाना था, लेकिन अब तक राशि तय ही नहीं हो सकी है।

जमीनी स्तर पर कोई गतिविधि शुरू नहीं हुई

प्रशासन अभी भी मुआवजा निर्धारण की प्रक्रिया में उलझा हुआ है, जिससे परियोजना की शुरुआत में देरी तय मानी जा रही है। मध्यप्रदेश रोड डेवलपमेंट कार्पोरेशन (एमपीआरडीसी) ने 28 अगस्त 2025 को निविदा खोलने के बाद रशियन बेस्ड कंपनी एलएलसी वोल्गादोस्त्रोय को सिविल वर्क का ठेका दिया है। बावजूद इसके, जमीनी स्तर पर कोई गतिविधि शुरू नहीं हो सकी है।

अधिकारियों के मुताबिक, निर्माण कार्य शुरू होने में अब भी कम से कम दो सप्ताह का समय लग सकता है। इस बीच, मुआवजे की मांग को लेकर किसानों का आक्रोश भी बढ़ता जा रहा है। हाल ही में किसानों ने एमपीआरडीसी कार्यालय पर धरना देकर विरोध जताया। किसानों का कहना है कि मुआवजा तय किए बिना निर्माण शुरू करना उनके हितों के खिलाफ होगा।

हाईवे की ऊंचाई को कम करने की तैयारी

प्रशासन के लिए यह असंतोष एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। परियोजना को लेकर एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। किसानों के आंदोलन और तकनीकी पुनर्मूल्यांकन के बाद हाईवे की ऊंचाई (एलिवेशन) कम करने की तैयारी चल रही है। संशोधित डिजाइन के अनुसार सिविल वर्क की लागत में लगभग 440 से 450 करोड़ रुपये की कमी आ सकती है।

पहले जहां कुल लागत करीब 2400 करोड़ आंकी गई थी, वहीं अब इसे घटाकर लगभग 1950 करोड़ करने का प्रस्ताव है। हालांकि इस संशोधित डिजाइन को शासन से अंतिम स्वीकृति मिलना बाकी है, जिससे काम और अधिक अटक गया है।

संभागायुक्त ने परियोजना को 30 नवंबर 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य तय किया है और साप्ताहिक मानिटरिंग की व्यवस्था भी लागू की है। उन्होंने साफ कहा है कि अब देरी का कोई बहाना स्वीकार नहीं होगा और संबंधित एजेंसियों को तत्काल काम शुरू करना होगा।

दो साल पहले प्रशासकीय स्वीकृति मिली थी

दो साल पहले 7 मार्च 2024 को उज्जैन-जावरा हाइवे निर्माण की प्रशासकीय स्वीकृति मिली थी। कायदे से अब तक हाइवे निर्माण पूरा हो जाना था, मगर विडंबना देखिये कि प्रशासनिक लापरवाही के चलते अब तक प्रोजेक्ट धरातल पर शुरू भी न हो सका है, जो व्यवस्था पर गंभीर सवाल है।

उज्जैन-जावरा हाईवे मालवा के औद्योगिक विकास के लिए धुरी साबित हो सकता है, लेकिन वर्तमान में यह प्रशासनिक इच्छाशक्ति और वित्तीय पारदर्शिता की परीक्षा ले रहा है। यदि 15 अप्रैल तक काम गति नहीं पकड़ता, तो सिंहस्थ से पहले इस परियोजना का पूर्ण होना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।

महंगी कंसल्टेंसी पर निर्भर निगरानी व्यवस्था

एमपीआरडीसी ने उज्जैन–इंदौर और उज्जैन–जावरा हाईवे की निगरानी के लिए ‘इंडिपेंडेंट इंजीनियर’ नियुक्त करने का फैसला किया है। इसके तहत उज्जैन–जावरा परियोजना के लिए 11.75 करोड़ और उज्जैन–इंदौर के लिए 11.63 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। कुल मिलाकर 23 करोड़ रुपये से अधिक केवल निगरानी पर खर्च होंगे।

यह व्यवस्था गुणवत्ता सुधार के साथ-साथ जिम्मेदारी तय करने के सवाल भी खड़े कर रही है। आलोचकों का तर्क है कि यह व्यवस्था गुणवत्ता सुधार से ज्यादा विभाग की अपनी जवाबदेही को आउटसोर्स करने का तरीका है। यदि सड़क खराब निकली, तो ठीकरा कंसल्टेंट पर फोड़ा जाएगा और अफसर सुरक्षित रहेंगे।



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