उज्जैन के रामघाट पर पानी में उतरे अफसर; निकाला कचरा, क्षीरसागर में तकनीक से लौटी पारदर्शिता
नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। एक ओर शिप्रा के पवित्र रामघाट पर अधिकारी खुद पानी में उतरकर जाल से कचरा निकालते नजर आए, तो दूसरी ओर सप्त सागरों में शामिल पौराणिक क्षीरसागर में मशीनों की मदद से पानी को फिर से स्वच्छ और पारदर्शी बनाने की कोशिश दिखाई दी। उज्जैन में शनिवार को सामने आए ये दोनों दृश्य केवल सफाई अभियान नहीं, बल्कि शहर की धार्मिक जल धरोहरों को बचाने की गंभीर जरूरत का संकेत भी बन गए।
सिंहस्थ-2028 की तैयारियों और स्वच्छ सर्वेक्षण की कसौटियों के बीच अब नगर निगम का फोकस केवल सड़कों और कॉलोनियों तक सीमित नहीं रहा। इस बार स्वच्छ सर्वेक्षण में जल संरचनाओं की स्वच्छता, जल गुणवत्ता और संरक्षण के भी अंक निर्धारित किए गए हैं। यही वजह है कि जन आस्था के सबसे बड़े केंद्र रामघाट और पौराणिक महत्व वाले क्षीरसागर कुंड को विशेष अभियान का हिस्सा बनाया गया है।
स्वच्छ भारत मिशन 2.0 के अंतर्गत जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत शनिवार को रामघाट पर विशेष श्रमदान और सफाई अभियान चलाया गया। घाट की सीढ़ियों से लेकर नदी के भीतर तक सफाई की गई। निगम अधिकारियों और कर्मचारियों ने श्रद्धालुओं से अपील की कि वे पूजन सामग्री सीधे शिप्रा में विसर्जित न करें। इसके लिए घाट पर निर्माल्य कुंड बनाए गए हैं, ताकि धार्मिक परंपराएं भी बनी रहें और नदी भी प्रदूषित न हो।
तकनीकी का प्रयोग

पौराणिक महत्व के क्षीर सागर में मशीन से सफाई होने से पानी अब ऐसा दिख रहा। (नईदुनिया प्रतिनिधि)
इधर, शहर के मध्य स्थित क्षीरसागर कुंड में पहली बार ‘नैनो डिफाटर साफ्ट एरिटर’ तकनीक का प्रयोग किया गया, जिसके परिणाम उत्साहजनक बताए जा रहे हैं। कलेक्टर रौशन कुमार सिंह और निगम आयुक्त अभिलाष मिश्रा ने शनिवार को कुंड का निरीक्षण कर पानी की गुणवत्ता का जायजा लिया।
अधिकारियों के अनुसार तकनीक के उपयोग से पानी में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ी है, दुर्गंध लगभग समाप्त हो गई है और करीब 1 से 1.5 फीट तक पानी साफ एवं पारदर्शी दिखाई देने लगा है। अधिक मास में सप्तसागर पूजन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने को देखते हुए यहां निर्माल्य कुंड, सूचना संकेतक, सौंदर्यीकरण और सुरक्षा गार्ड की व्यवस्था भी की गई है। निगम ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि कुंड में किसी भी प्रकार की गंदगी न की जाए।
केवल एक-दो दिन के अभियान से स्थायी बदलाव संभव नहीं
पूरे मामले में शहरवासियों का कहना है कि केवल एक-दो दिन के अभियान से स्थायी बदलाव संभव नहीं होगा। पहले भी कई बार घाटों और तालाबों की सफाई हुई, लेकिन नियमित निगरानी, रखरखाव और जवाबदेही के अभाव में कुछ समय बाद स्थिति फिर खराब हो गई। यही कारण है कि अब जरूरत निरंतर सफाई, सतत मॉनिटरिंग और जनभागीदारी की है, ताकि रामघाट और क्षीरसागर जैसे आस्था केंद्र ‘धाक के वही तीन पात’ वाली स्थिति में दोबारा न पहुंचें। उज्जैन यदि अपनी धार्मिक पहचान के साथ स्वच्छ जल विरासत का राष्ट्रीय मॉडल बनना चाहता है, तो यह अभियान निरंतर चलना ही होगा।