उज्जैन में 2000 साल पहले भी निकलती थी भगवान महाकाल की सवारी
भगवान महाकाल की शाही सवारी केवल सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि इसकी जड़ें दो हजार वर्ष से भी अधिक पुराने अवंती के इतिहास तक पहुंचती हैं। महि…और पढ़ें

HighLights
- दुर्लभ प्राचीन मुद्रा पर पालकी में विराजमान भगवान महाकाल अंकित हैं
- नंदी और जलजीवों का अंकन भी इस प्राचीन परंपरा का पुरातात्विक साक्ष्य सामने रखता है
- यह मुद्रा सम्राट विक्रमादित्य काल की है और विश्व में ज्ञात अनूठी मुद्राओं में शामिल है
नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन – महिदपुर : भगवान महाकाल की शाही सवारी केवल सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि इसकी जड़ें दो हजार वर्ष से भी अधिक पुराने अवंती के इतिहास तक पहुंचती हैं। महिदपुर के अश्विनी शोध संस्थान के संग्रहालय में संरक्षित एक दुर्लभ प्राचीन मुद्रा पर पालकी में विराजमान भगवान महाकाल, उनके समीप नंदी और नीचे जलजीवों का अंकन इस प्राचीन परंपरा का महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य सामने रखता है।
संस्थान के अनुसार यह मुद्रा सम्राट विक्रमादित्य काल की है और विश्व में ज्ञात ऐसी अनूठी मुद्राओं में शामिल है, जिस पर पालकी में विराजमान महाकाल का चित्रांकन मिलता है। मुद्रा के एक ओर स्पष्ट रूप से एक पालकी का दृश्य उकेरा गया है। इसमें भगवान महाकाल विराजमान हैं और उनके दाहिनी ओर उनके वाहन नंदी पालकी की ओर निहारते हुए दिखाई देते हैं।
मुद्रा के निचले हिस्से में विभिन्न जलजीवों का अंकन है। इसे क्षिप्रा नदी का प्रतीकात्मक चित्रण माना गया है। महाकाल की सवारी, नंदी और शिप्रा- एक ही मुद्रा पर इन धार्मिक प्रतीकों का संयोजन अवंती की तत्कालीन धार्मिक परंपराओं की ओर महत्वपूर्ण संकेत करता है।
मुद्रा के पीछे छिपा उज्जैन का इतिहास
इस मुद्रा का एक और पहलू इसे विशेष बनाता है। इसके पृष्ठ भाग पर चार बिंदुओं वाला उज्जैन चिह्न अंकित है। डा. आरसी ठाकुर के अनुसार यह उज्जैन के प्राचीन टकसाल से जुड़े होने का महत्वपूर्ण संकेत है। यानी यह केवल धार्मिक चित्रांकन वाली मुद्रा नहीं, बल्कि तत्कालीन उज्जैन की मुद्रा-निर्माण परंपरा और राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रभाव की भी गवाही देती है।