उज्जैन में सिंहस्थ दो महीने का, फिर 700 करोड़ की स्थायी पाइपलाइन क्यों; योजना पर उठे सवाल
नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। महाकुंभ सिंहस्थ- 2028 की तैयारियों के नाम पर उज्जैन में प्रस्तावित 700 करोड़ रुपये का सीवरेज और वाटर सप्लाई प्रोजेक्ट अब बड़े विवाद का रूप लेता जा रहा है। जिस सिंहस्थ क्षेत्र में स्थायी निर्माण पर प्रतिबंध है, वहीं 300 किलोमीटर सीवरेज और 300 किलोमीटर पानी लाइन बिछाने की योजना पर सवाल उठ रहे हैं। किसान, जनप्रतिनिधि और विशेषज्ञ आमने-सामने हो गए हैं।
विरोध इसलिए भी तेज है क्योंकि इन लाइनों का वास्तविक उपयोग केवल सिंहस्थ के दो महीने ही होना है, जबकि इसके लिए किसानों की जमीन स्थायी रूप से प्रभावित होना तय है। जानकारों का दावा है कि अस्थायी व्यवस्था से यह काम बेहद कम लागत में हो सकता है, फिर भी करोड़ों रुपये की स्थायी परियोजना तैयार की जा रही है। अब यह मामला विकास से ज्यादा खर्च और उपयोगिता की बहस बनता जा रहा है।
12 साल बाद फिर नई लाइन डालने की जरूरत पड़ी तो क्या माना जाएगा
जानकारों और जनप्रतिनिधियों का तर्क है कि सिंहस्थ हर 12 साल में एक बार आता है। ऐसे में करोड़ों रुपए खर्च कर स्थायी सीवरेज लाइन बिछाने का औचित्य समझ से परे है। सवाल यह भी उठ रहा है कि अगले सिंहस्थ तक इन लाइनों की स्थिति क्या रहेगी। यदि 12 साल बाद फिर नई लाइन डालने की जरूरत पड़ी तो वर्तमान प्रोजेक्ट की उपयोगिता क्या मानी जाएगी। इसी कारण अब यह पूरा प्रोजेक्ट विकास से ज्यादा सरकारी धन के बड़े खर्च के रूप में देखा जाने लगा है।
प्रोजेक्ट को लेकर एक और बड़ा विवाद किसानों की जमीन अधिग्रहण का है। योजना के अनुसार सिंहस्थ क्षेत्र में 15 मीटर चौड़ी सड़क बनाई जाएगी। इसके अलावा सड़क के दोनों ओर 4.5-4.5 मीटर अतिरिक्त जमीन भी ली जाएगी। यानी कुल 9 मीटर अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण होगा। किसानों का कहना है कि दो महीने के उपयोग वाले प्रोजेक्ट के लिए स्थायी रूप से उनकी जमीन प्रभावित की जा रही है। सीवरेज लाइन और सड़क निर्माण के बाद खेतों की स्थिति भी खराब हो सकती है।
इतना बड़ा खर्च क्यों किया जा रहा
इस पूरे मामले में यह सवाल भी प्रमुखता से उठ रहा है कि जब अस्थायी व्यवस्था से काम हो सकता है तो स्थायी निर्माण पर इतना बड़ा खर्च क्यों किया जा रहा है। पूर्व के सिंहस्थ में अस्थायी व्यवस्थाएं बनाई जाती रही हैं।
प्रयागराज और हरिद्वार जैसे कुंभ क्षेत्रों में भी अस्थायी सीवरेज और ड्रेनेज सिस्टम का उपयोग किया जाता है। जानकारों का दावा है कि यदि उज्जैन में भी अस्थायी सीवरेज लाइन डाली जाए तो पूरा काम करीब 100 करोड़ रुपये में पूरा हो सकता है। इसके बावजूद 600 करोड़ रुपये का स्थायी प्रोजेक्ट प्रस्तावित किया गया है।
एमआईसी लौटा चुकी प्रस्ताव
नगर निगम की एमआईसी बैठक में भी इस प्रोजेक्ट पर सवाल उठ चुके हैं। महापौर विषय को समझने के बाद ही स्वीकृति देने का कहकर प्रस्ताव लौटा चुके हैं। सबसे बड़ा विवाद काम को अलग-अलग एजेंसियों में बांटने को लेकर है। प्रस्ताव के अनुसार एक एजेंसी यानी उज्जैन विकास प्राधिकरण सड़क बनाएगी, दूसरी एजेंसी यानी नगर निगम सीवरेज एवं वाटर सप्लाई पाइपलाइन डालेगी।
सवाल ये है कि जब पूरा काम एक ही क्षेत्र में होना है तो अलग-अलग एजेंसियों की जरूरत क्यों पड़ रही है। शहर पहले भी देख चुका है कि एक विभाग सड़क बनाता है और दूसरा उसे खोद देता है। ऐसे में जवाबदेही तय करना मुश्किल हो जाता है। महापौर परिषद ने फिलहाल इस प्रस्ताव पर रोक लगाकर प्रशासन से स्पष्ट कार्ययोजना मांगी है।
टाटा प्रोजेक्ट्स के अधूरे सीवरेज कार्यों का पुराना अनुभव भी नगर निगम के सामने चुनौती बना हुआ है। अब उसी काम को कई हिस्सों में बांटकर नई एजेंसियों से कराने की तैयारी ने संदेह और बढ़ा दिया है। सिंहस्थ की तैयारियों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह प्रोजेक्ट वास्तव में जरूरत है या फिर करोड़ों रुपए खर्च करने वाली ऐसी योजना, जिसकी उपयोगिता पर शुरुआत से ही प्रश्न खड़े हो रहे हैं।
शहरी सीवरेज प्रोजेक्ट से लागत केवल 135 करोड़ अधिक
आपको जानकर हैरानी होगी कि अमृत मिशन अंतर्गत शहर के 54 वार्डों में बिछ रही सीवरेज पाइपलाइन प्रोजेक्ट से सिंहस्थ सीवरेज प्रोजेक्ट की लागत केवल 135 करोड़ रुपये अधिक है। शहरी क्षेत्र में सीवरेज पाइपलाइन बिछाने का प्रथम चरण का काम 438 करोड़ रुपये में वर्ष 2017 में टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड को दो वर्ष में पूर्ण करने के लिए सौंपा था।
आठ साल गुजर गए मगर काम अब भी अधूरा है। दूसरे चरण का काम सालभर पहले एनपी पटेल को 397 करोड़ रुपये में एनपी पटेल कंपनी को सौंपा था, जिसे अगले एक वर्ष में प्रोजेक्ट पूरा करके देना है।