उज्जैन का अनोखा भूखी माता मंदिर, जहां मदिरा और बलि का चढ़ता है प्रसाद; पढ़ें कैसे शुरू हुई परंपरा?


डिजिटल डेस्क। मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन, जो अपने चमत्कारी मंदिरों के लिए विश्व प्रसिद्ध है, वहीं शिप्रा नदी के तट पर स्थित ‘भूखी माता मंदिर’ अपनी अनूठी और रहस्यमयी परंपराओं के लिए श्रद्धालुओं और तंत्र साधकों के बीच विशेष आस्था का केंद्र है।

मान्यता है कि इस मंदिर में कभी नरबलि की प्रथा थी, जिसे सम्राट विक्रमादित्य ने अपनी चतुराई और साहस से समाप्त करवाया था।

नरबलि से पशुबलि तक का सफर

मंदिर के पुजारी विजय चौहान के अनुसार, प्राचीन काल में यहाँ स्थित माता भुवनेश्वरी और भूखी माता को प्रसन्न करने के लिए प्रतिदिन एक नरबलि दी जाती थी। जब सम्राट विक्रमादित्य को इस क्रूर प्रथा का पता चला, तो उन्होंने इसे समाप्त करने का निर्णय लिया। सम्राट ने स्वादिष्ट पकवान बनवाकर उन्हें एक पुतले में भर दिया। जब माता उस पुतले का भक्षण करने आईं, तो पकवानों से तृप्त होकर वे अत्यंत प्रसन्न हुईं।

प्रसन्न होकर माता ने विक्रमादित्य को वरदान मांगने को कहा। सम्राट ने वचन मांगा कि माता अब हमेशा के लिए शिप्रा तट पर ही विराजमान रहेंगी और उज्जैन नगरी की रक्षा करेंगी। तब से माता यहीं स्थापित हैं।

आज भी जारी है मदिरा और बलि की परंपरा

भले ही नरबलि की प्रथा सदियों पहले बंद हो गई हो, लेकिन आज भी यहाँ तांत्रिक और पारंपरिक पद्धतियों से पूजा की जाती है।

अपनी मन्नतें पूरी होने पर श्रद्धालु आज भी यहाँ पशु बलि चढ़ाते हैं और माता को मदिरा (शराब) का भोग लगाया जाता है।

वर्ष में दो बार, नवरात्रि की अष्टमी पर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और प्रशासन द्वारा माता की विशेष ‘नगर पूजा’ की जाती है, जिसमें मदिरा की धार चढ़ाई जाती है।

तंत्र साधना और अटूट आस्था

भूखी माता को देवी कालिका का स्वरूप माना जाता है, यही कारण है कि यहाँ साल के 365 दिन तंत्र साधकों का जमावड़ा लगा रहता है। विशेष मनोकामनाओं के लिए यहाँ यज्ञ और अनुष्ठान किए जाते हैं।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, माता को नींबू की माला और ‘भूरा कोला’ (कुष्मांड) चढ़ाने से वे शीघ्र प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं।

शिप्रा के पावन तट पर स्थित यह मंदिर न केवल उज्जैन की सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है, बल्कि यह प्राचीन भारतीय इतिहास और लोक मान्यताओं के अद्भुत संगम को भी दर्शाता है।



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