नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। मध्य प्रदेश सरकार एक करोड़ एक लाख रुपये का ‘सम्राट विक्रमादित्य अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार’ हर वर्ष प्रदान करेगी। महाशिवरात्रि पर आयोजित विक्रमोत्सव-2026 के शुभारंभ समारोह में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसकी घोषणा की।
यह भारत का पहला ऐसा अंतरराष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार होगा, जो हर वर्ष उन विशिष्ट वैश्विक व्यक्तित्वों को मिलेगा, जिन्होंने अपने जीवन और कार्यों से सम्राट विक्रमादित्य के उच्च आदर्शों (सुशासन, दानशीलता, प्रज्ञा, न्यायप्रियता, विज्ञानबोध, संस्कृति-प्रेम और लोककल्याण) का उदाहरण प्रस्तुत किया हो।
प्रदेश सरकार 21 लाख रुपये का ‘सम्राट विक्रमादित्य राष्ट्रीय सम्मान’ और पांच-पांच लाख रुपये के तीन प्रादेशिक शिखर सम्मान भी देगी। पुरस्कार के लिए दावा प्रस्तुत करने को महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ अधिसूचना जारी करने की तैयारी में है। समय से प्रविष्टियां प्राप्त होकर चयन प्रक्रिया पूरी हुई तो इसी वर्ष गुड़ी पड़वा, 19 मार्च को रामघाट-दत्त अखाड़ा घाट पर होने वाले कार्यक्रम में पुरस्कार प्रदान किया जाएगा।
मुख्यमंत्री ने बताया कि इस पहल का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति, कला, साहित्य और वैश्विक स्तर पर भारतीय वैचारिक प्रभाव को प्रतिष्ठित करना है। सम्मान के साथ ही अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विभूतियों को उज्जयिनी की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा, जिससे विक्रमोत्सव को वैश्विक पहचान मिल सके। प्रदेश सरकार अब तक ‘विक्रम अलंकरण’ के माध्यम से उन विशिष्ट व्यक्तित्वों को सम्मानित करती रही है, जिनमें सम्राट विक्रमादित्य के ‘नवरत्नों’ की प्रतिभा दिखती हो।
नवरत्नों में धन्वंतरि (चिकित्सा), कालिदास (साहित्य), वराहमिहिर (खगोल), शंकु (वास्तु), वररुचि (व्याकरण), घटकर्पर (नीति), बेतालभट्ट (कथा), क्षपणक (तत्वज्ञान) और अमरसिंह (शब्दकोश) जैसे विद्वान शामिल थे।
तीन स्तरों पर होंगे विक्रमादित्य अलंकरणअंतरराष्ट्रीय पुरस्कार : एक करोड़ एक लाख रुपयेराष्ट्रीय पुरस्कार : 21 लाख रुपयेराज्य स्तरीय पुरस्कार : पांच-पांच लाख रुपये के तीन अलंकरण (नोट : कुल छह सम्मान प्रतिवर्ष दिए जाने का प्रस्ताव है)
सम्राट विक्रमादित्य : परंपरा के प्रज्वलित प्रतीक
उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य भारतीय इतिहास में शकारि, संवत् प्रवर्तक और न्यायप्रिय राजा के रूप में अमर हैं। उन्होंने विदेशी आक्रांताओं को परास्त कर विक्रम संवत की स्थापना की और भारतीय कालगणना को प्रतिष्ठा दिलाई। कला, विज्ञान, खगोल, नीतिशास्त्र, योग और राजनीति में उनका योगदान अतुलनीय था।
माना जाता है कि दो हजार वर्ष पूर्व उन्होंने ही अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण करवाया था। उनके सुशासन की स्मृति भारतवर्ष में आज भी जीवित है रामराज्य के बाद यदि किसी आदर्श शासन का उल्लेख होता है तो वह विक्रमादित्य का होता है।

