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88 साल पहले की खोदाई में मिले थे नरकंकाल, उज्जैन की कुम्हार टेकरी को फिर खोदने के लिए प्रस्ताव


नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन : वर्ष 1938-39 का समय, जब उज्जैन के उंडासा क्षेत्र के कुम्हार टेकरी और वैश्य टेकरी पर ग्वालियर स्टेट के पुरातत्वविद् डॉ. एम.बी. गर्दे ने खोदाई कार्य शुरू किया। चकित कर देने वाली बात थी कि दोनों स्थानों पर की गई खोदाई में अलग-अलग अवस्थाओं में नरकंकाल मिले व कुछ प्राचीन सामग्रियां भी। तब इन्हें कोलकाता भेजा गया, जो आज भी वहां सुरक्षित हैं।

खास बात यह है कि तब से लेकर आज तक इस क्षेत्र में किसी भी तरह की कोई खोदाई नहीं हुई है। अब इस स्थान की पुन: खोदाई हो सकती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के भोपाल मंडल द्वारा इस स्थल की खोदाई का प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया है। जानकार कहते हैं कि खोदाई और अन्वेषण से इतिहास से जुड़े कई प्रश्नों को उत्तर मिल सकते हैं।

उज्जैन में उंडासा तालाब के पास स्थित है कुम्हार टेकरी। ये टेकरी अब टेकरी न होकर सामान्य जमीन की स्थिति में है। तालाब की ओर थोड़ा सा ढलान अवश्य है। इसी से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर उज्जैन की ओर वैश्य टेकरी स्थित है। ये दोनों टेकरी को उंडासा क्षेत्र में माना जाता है।

खोदाई के दौरान मिले पात्र। (सौजन्य)

वर्ष 1938 में ग्वालियर स्टेट के पुरातत्वविद एम.बी. गर्दे के निर्देशन में खोदाई कार्य किया गया था। दोनों क्षेत्र में की गई खोदाई में लगभग 42 नरकंकाल मिले थे। इसके साथ ही अन्य मृदभांड, पंचमार्क मुद्राएं सहित अन्य पात्र भी मिले थे। सिक्के तांबे के थे। ये सभी नरकंकाल बौद्धकाल के बताए जाते हैं।

नरकंकालों को भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण कोलकाता में भेजा गया। पुरातत्वविद डा. रमन सोलंकी ने बताया कि वर्ष 1938 में दोनों क्षेत्र में खोदाई की गई थी। तब ये सभी सामग्रियां और अवशेष मिले थे।

बैठे हुए, उलटे लेटे हुए कंकाल

वर्ष 2007 में इस संबंध में कार्य कर चुकी डेक्कन कालेज और रिसर्च इंस्टीट्यूट पुणे की एसोसिएट प्रोफेसर डा. वीणा मुशरीफ-त्रिपाठी ने बताया कि पुरातत्व संबंधी खोजों और कंकालों के मिलने के आधार पर कहा जा सकता है कि ये लोग शायद अलग-अलग समुदायों से थे। कंकाल अलग-अलग स्थितियों में मिले हैं – जैसे बैठे हुए, पीठ के बल लेटे हुए या उलटे, पैर मुड़े हुए आदि। खोदाई की रिपोर्ट से पता चलता है कि लोग शवों को दफनाने और शायद दाह-संस्कार के अलग-अलग तरीकों का पालन करते थे। इनमें बच्चे और वयस्क दोनों शामिल हैं और स्त्री-पुरुष दोनों के कंकाल मिले हैं।

फिर से अध्ययन करने की बहुत जरूरत

डा. त्रिपाठी बताती हैं कि एन्थ्रोपोलाजी (मनुष्य जाति का विज्ञान) के नजरिए से इस सामग्री का फिर से अध्ययन करने की बहुत ज़रूरत है। नई और आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करने की भी ज़रूरत है, ताकि उन्हें कालक्रम के अनुसार व्यवस्थित किया जा सके।

केंद्रीय मुख्यालय को भेजा है प्रस्ताव

भोपाल मंडल के अधीक्षक पुरातत्वविद् शिवाकांत वाजपेयी ने बताया कि वैश्य टेकरी की खोदाई का प्रस्ताव हमने अपने केंद्रीय मुख्यालय को भेजा है। कुम्हार टेकरी भी उसी के पास है। वैश्य टेकरी की खोदाई होगी तो कुम्हार टेकरी से संबंधित कुछ जानकारी भी मिल सकती है। दोनों के बीच कोई संबंध है तो वह भी समझ में आएगा।

आसपास के रहवासियों के अलग-अलग तर्क

इस संबंध में कुम्हार टेकरी और वैश्य टेकरी के आसपास के स्थानीय लोगों से भी जानकारी ली गई। उनका कहना है कि 1938 में खोदाई शुरू की गई थी। उस समय नरकंकाल और कई सारी सामग्रियां मिली थीं। लेकिन जमीन से जहरीली गैस निकलने के कारण कई मजदूर बेहोश हो गए। तब खोदाई का काम बंद कर दिया गया। अब वैश्य टेकरी के आसपास लगभग 40 वर्षों से खेती की जा रही है।

बौद्ध स्मारक है वैश्य टेकरी

यह भी उल्लेखनीय है कि तराना रोड पर स्थित वैश्य टेकरी बौद्ध समुदाय के लिए किसी तीर्थ स्थान से कम नहीं है। उज्जैन पर शोधपूर्ण लेखन करने वाले वरिष्ठ लेखक 90 वर्षीय रमेश दीक्षित ने अपनी पुस्तक उज्जयिनी : अक्षर ऐश्वर्य में इसका जिक्र करते हुए बताया कि भगवान बुद्ध के जीवनकाल में अवंती का राजा चंड प्रद्योत महासेन था, जिसकी पुत्री वासवदत्ता का विवाह वत्सराज उदयन से हुआ था।

यह टेकरी राजा प्रद्योत के मनोरम तालद्रुमवन कांचनवन में उज्जैन-आगर मार्ग पर मकोड़िया आम से पूर्व दिशा में स्थित ग्राम कानीपुरा के पास बनी हुई है। मौर्यकालीन स्तूप के भग्नावशेषों को यह टेकरी वर्तमान में सब ओर से ऊपर तक मिट्टी से आवृत्त किए हैं। यह बौद्धकालीन पुरा-संपदा केंद्रीय पुरातत्व विभाग के सीधे नियंत्रण में है।

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