नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। महाकाल की नगरी उज्जैन में आगामी सिंहस्थ-2028 को दिव्य, भव्य और सुव्यवस्थित बनाने की दिशा में तैयारियां तेज हो गई हैं। इसी क्रम में आयोजित कार्यशाला “सिंहस्थ-2016 के अनुभव और 2028 का संकल्प” में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने स्पष्ट कहा कि सिंहस्थ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की सनातन संस्कृति, सामाजिक समरसता और प्रशासनिक क्षमता का विश्व के सामने प्रस्तुत होने वाला सबसे बड़ा मंच है।
सीएम ने कहा कि महाकाल की कृपा से उज्जैन से जुड़ने का अवसर मिलता है और यह जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्थायी और दूरदर्शी व्यवस्थाएं विकसित की जाएं। मुख्यमंत्री ने कहा कि अब समय केवल अस्थायी इंतजामों का नहीं, बल्कि ऐसे विकास कार्यों का है, जिनका लाभ सिंहस्थ के बाद भी शहर और प्रदेश को लंबे समय तक मिलता रहे।
उन्होंने संकेत दिए कि वर्ष 2025 के बाद सिंहस्थ से जुड़े बुनियादी ढांचे के विकास को और गति मिलेगी तथा जल प्रबंधन, स्वच्छता, यातायात, घाट विकास, सीवर व्यवस्था और श्रद्धालु सुविधाओं के लिए बड़े पैमाने पर कार्य किए जाएंगे।
उज्जैन के समग्र विकास से जोड़ा जा रहा
उन्होंने कहा कि उज्जैन की विशेषता यह है कि यह नगरी स्वयं लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। यहां आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं को बेहतर अनुभव प्रदान करना प्रशासन और समाज की साझा जिम्मेदारी है। सिंहस्थ-2028 की तैयारियों को केवल आयोजन तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि इसे उज्जैन के समग्र और दीर्घकालिक विकास से जोड़ा जा रहा है।
कार्यशाला में सिंहस्थ-2004 और सिंहस्थ-2016 से जुड़े संस्मरण भी साझा किए गए। तत्कालीन कलेक्टर कवीन्द्र कियावत ने बताया कि विशाल जनसमूह, सीमित संसाधनों और समयबद्ध व्यवस्थाओं के बीच प्रशासन ने समन्वय और नवाचार के माध्यम से सफल आयोजन कराया था। वर्तमान एडीजे राकेश गुप्ता ने कहा कि इतने बड़े धार्मिक आयोजन की सफलता का आधार प्रशासन, समाज और संत समाज के बीच बेहतर संवाद और सहभागिता है।
पर्यावरण संरक्षण भी तैयारियों का महत्वपूर्ण हिस्सा
संभागायुक्त आशीष सिंह ने सिंहस्थ-2028 की तैयारियों का विस्तृत खाका प्रस्तुत करते हुए कहा कि इस बार व्यवस्थाओं को भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि शिप्रा नदी की स्वच्छता, स्थायी सीवर नेटवर्क, बेहतर सड़क एवं रेल संपर्क, पार्किंग, डिजिटल ट्रैफिक प्रबंधन, नए घाटों का विकास और श्रद्धालुओं की सुविधाओं पर विशेष फोकस किया जा रहा है।
इसके अलावा भीड़ प्रबंधन, आपदा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण को भी तैयारियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। कार्यशाला का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही रहा कि सिंहस्थ-2028 केवल एक धार्मिक मेला नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक विरासत और आधुनिक प्रबंधन क्षमता का संगम होगा।
मुख्यमंत्री ने आह्वान किया कि 2004 और 2016 के अनुभवों से सीख लेते हुए ऐसा सिंहस्थ आयोजित किया जाए, जो विश्व स्तर पर भारतीय संस्कृति, व्यवस्थागत दक्षता और सामाजिक सहभागिता का नया मानक स्थापित करे।

