Site icon Mahakal Mandir News

महाभारत का ‘युद्ध विज्ञान’ महाकाल नगरी में जीवंत, पहली बार उज्जैन में सजे 100 से अधिक अस्त्र-शस्त्र


नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। महाभारत, जिसे विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य और भारतीय युद्ध विज्ञान का मूल स्रोत माना जाता है, अब उज्जैन में शोध आधारित अस्त्र-शस्त्र प्रदर्शनी के रूप में जीवंत हो उठा है। महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ परिसर में सजी इस प्रदर्शनी का शुभारंभ महाशिवरात्रि पर हुआ, जो 19 मार्च तक देशभर के दर्शकों के लिए खुली रहेगी।

उद्देश्य, महाभारत को धार्मिक आख्यान से आगे बढ़ाकर भारतीय सैन्य परंपरा, व्यूह रचना और रणनीतिक चिंतन के वैज्ञानिक दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत करना है। प्रदर्शनी में महाभारत युद्ध में वर्णित 100 से अधिक अस्त्र-शस्त्रों के बड़े माडल प्रदर्शित किए गए हैं।

इनमें गदा, धनुष-बाण, तलवार, भाला, ढाल, सुदर्शन चक्र और वज्र की प्रतिकृतियां शामिल हैं। 18 दिन चले युद्ध की 14 प्रमुख व्यूह रचनाओं के त्रि-आयामी माडल तैयार किए गए हैं, जिनसे सेना की संरचना, घेराबंदी और आक्रमण-रक्षा की रणनीति को समझाया जा रहा है।

युद्ध आचरण-नियमों की भी जानकारी दी जा रही

45 पताकाएं और 11 शंख प्रतिरूप प्राचीन युद्ध संकेत प्रणाली को दर्शाते हैं, जो उस काल की संचार व्यवस्था और सैन्य अनुशासन का प्रमाण हैं। इस प्रदर्शनी की विशेषता यह है कि यहां केवल हथियारों का प्रदर्शन नहीं, बल्कि उनके प्रयोग की तकनीक, संबंधित योद्धाओं, रथ व्यवस्था, सेना संरचना और युद्ध आचरण-नियमों की भी जानकारी दी जा रही है।

आयोजक विक्रमादित्य शोधपीठ से जुड़े राहुल रस्तोगी के अनुसार महाभारत को इतिहास, नीति, कूटनीति और युद्धशास्त्र के समन्वित ग्रंथ के रूप में समझाना ही इसका उद्देश्य है, ताकि नई पीढ़ी भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े।

राष्ट्रीय स्तर पर यह प्रदर्शनी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इससे पहले ऐसी पहल भोपाल के भारत भवन में हुई थी और अब उज्जैन में इसे स्थायी शैक्षणिक स्वरूप देने की दिशा में प्रयास किया जा रहा है। इतिहासकारों और शिक्षाविदों का मानना है कि यह पहल भारतीय युद्ध विज्ञान, रणनीतिक सोच और सांस्कृतिक विरासत को अकादमिक विमर्श से जोड़ने का माध्यम बन सकती है।

14 माह का शोध, 12 लाख की लागत

सभी प्रतिकृतियां गहन शोध पर आधारित हैं। इंदौर के शोधकर्ता राज बेन्द्र ने आठ माह तक ग्रंथों और ऐतिहासिक स्रोतों का अध्ययन कर रूपरेखा तैयार की, जिसके बाद छह माह में माडल निर्मित कराए गए। निर्माण पर लगभग 12 लाख रुपये खर्च हुए। आकार, अनुपात और उपयोग विधि को प्रमाणिक बनाने के लिए पारंपरिक विवरणों का विशेष ध्यान रखा गया है।

युद्ध पद्धति को समझने का दुर्लभ अवसर

महाभारत केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि सैन्य संगठन, व्यूह रचना, संचार प्रणाली, मनोवैज्ञानिक युद्ध और आचरण नियमों का विस्तृत दस्तावेज माना जाता है। इसमें सेना संरचना, रथ युद्ध, गदा युद्ध, धनुर्विद्या और संकेत पद्धति का वैज्ञानिक वर्णन मिलता है, जो भारतीय रणनीतिक परंपरा की प्राचीन जड़ों को दर्शाता है।

विद्यार्थियों, शोधार्थियों और सैन्य इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए यह प्रदर्शनी प्राचीन भारत की तकनीकी क्षमता, संगठन कौशल और नीति-आधारित युद्ध पद्धति को समझने का दुर्लभ अवसर प्रदान कर रही है।

यह भी पढ़ें : अर्धनारीश्वर हैं शिव तो उनके महाकाल रूप की भस्म आरती देखने से नारी को क्यों कर दिया है दूर, जानें इसका पौराणिक रहस्य



Source link

Exit mobile version