नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। फुटपाथ लोगों के चलने के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन उज्जैन में कई जगह उन पर अब लोगों का नहीं, दुकानों और अतिक्रमणकारियों का कब्जा है। चामुंडा माता मंदिर से चरक अस्पताल तक आगर रोड का हाल इसकी बानगी है।
यहां फुटपाथ पर चाय-पोहा और नाश्ते की दुकानें सज गई हैं, जबकि सड़क किनारे वाहनों की पार्किंग ने बची हुई जगह भी घेर ली है। नतीजा यह है कि पैदल चलने वालों को रोजाना तेज रफ्तार वाहनों के बीच जान जोखिम में डालकर सड़क पर चलना पड़ रहा है।
हैरानी की बात यह है कि यह सब उन अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की आंखों के सामने हो रहा है जो सड़क सुरक्षा और अतिक्रमण नियंत्रण की जिम्मेदारी संभालते हैं। नगर निगम की कार्रवाई भी ऐसी साबित हो रही है जो सुबह दिखती है और शाम तक गायब हो जाती है। सवाल यही है कि जब फुटपाथ पैदल यात्रियों के लिए बने हैं, तो उन पर सबसे कम अधिकार आखिर पैदल चलने वालों का ही क्यों रह गया है।
चामुंडा माता मंदिर के पास आगर रोड के फुटपाथ पर होटल और सड़क किनारे पार्किंग ने घेरा रास्ता। सुरक्षित आवागमन की जगह जोखिम उठाने को मजबूर आमजन। (नईदुनिया प्रतिनिधि)
निरंतर निगरानी और कार्रवाई जरूरी
तस्वीर में साफ दिखाई देता है कि फुटपाथ पर दुकानें संचालित हो रही हैं, खाना बनाया जा रहा है और ग्राहकों के बैठने की व्यवस्था तक कर ली गई है। ऐसे में पैदल चलने वालों के पास सड़क पर उतरने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। लोगों का कहना है कि नगर निगम समय-समय पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई तो करता है, लेकिन उसका असर कुछ घंटों या कुछ दिनों से ज्यादा नहीं रहता। सुबह अतिक्रमण हटाया जाता है और शाम तक वही स्थिति फिर से बन जाती है। यही कारण है कि वर्षों से समस्या जस की तस बनी हुई है। निरंतर निगरानी और कार्रवाई जरूरी है।
अफसर-जनप्रतिनिधियों की आंख के सामने हो रहा सब
हैरानी की बात यह है कि यह पूरा घटनाक्रम उन अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की आंखों के सामने हो रहा है जो शहर की यातायात व्यवस्था और सड़क सुरक्षा के लिए जिम्मेदार हैं। महापौर, कलेक्टर और संभागायुक्त कई बार मुख्य मार्गों को अतिक्रमण मुक्त रखने, फुटपाथ खाली कराने और दुर्घटना संभावित स्थलों से बाधाएं हटाने के निर्देश दे चुके हैं। इसके बावजूद आगर रोड, मक्सी रोड, देवास रोड सहित अधिकांश प्रमुख मार्गों पर अतिक्रमण और अव्यवस्थित पार्किंग का कब्जा बना हुआ है।
शहर में फुटपाथों की स्थिति पर नजर डालें तो एक और गंभीर सवाल खड़ा होता है। नगर निगम इन दिनों वायु गुणवत्ता सुधार और सौंदर्यीकरण योजनाओं के तहत इंजीनियरिंग कॉलेज रोड तथा विक्रम नगर रेलवे स्टेशन पहुंच मार्ग पर नए फुटपाथ विकसित कर रहा है। लेकिन जिन क्षेत्रों में सबसे अधिक पैदल आवाजाही होती है, वहां या तो फुटपाथ बने ही नहीं हैं या फिर वे अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं। फ्रीगंज, पुराने शहर और कई प्रमुख बाजार क्षेत्रों में पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित मार्ग आज भी सपना बने हुए हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी शहर की गुणवत्ता का आकलन उसकी सड़कों से नहीं, बल्कि पैदल यात्रियों के लिए उपलब्ध सुरक्षित सुविधाओं से किया जाता है। जब नागरिकों को अपने ही शहर में पैदल चलने के लिए सड़क पर जान जोखिम में डालनी पड़े तो यह केवल अतिक्रमण का नहीं, बल्कि शहरी प्रबंधन की विफलता का भी मामला है। यदि प्रशासन वास्तव में सड़क सुरक्षा को लेकर गंभीर है तो उसे अभियान आधारित कार्रवाई के बजाय स्थायी और कठोर व्यवस्था लागू करनी होगी, अन्यथा फुटपाथों पर कब्जे और सड़कों पर बढ़ता खतरा यूं ही बना रहेगा।
फुटपाथ गायब तो बढ़ जाते हैं खतरे
- पैदल यात्रियों को तेज रफ्तार वाहनों के बीच चलना पड़ता है।
- बच्चों और बुजुर्गों के सड़क हादसों का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
- अस्पताल और स्कूल जाने वालों के लिए आवागमन असुरक्षित हो जाता है।
- वर्षा के दौरान सड़क पर फिसलन और दुर्घटना की आशंका बढ़ती है।
- दिव्यांग और दृष्टिबाधित लोगों के लिए आवागमन बेहद कठिन हो जाता है।
- पैदल यात्री सड़क पर उतरते हैं तो यातायात की गति प्रभावित होती है और जाम की स्थिति बनती है।
- फुटपाथ पर कब्जे से सड़क की उपयोगी चौड़ाई भी कम हो जाती है।

