भारत के विभिन्न अभिलेखागारों में आज भी लगभग 40 लाख ऐसे दस्तावेज मौजूद हैं, जिन्हें आज तक कोई पढ़ नहीं सका है। …और पढ़ें

HighLights
- मध्यप्रदेश को ऐसे ”इतिहास-दूतों” की नई टोली मिली है, जो 800 साल पुराने गौरवशाली इतिहास को फिर से जीवंत करेगी
- आज भी लगभग 40 लाख ऐसे दस्तावेज मौजूद हैं, जिन्हें आज तक कोई पढ़ नहीं सका है
- यह लिपि मात्र लिखावट नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों का राजकाज, उनकी संस्कृति और दैनिक जीवन का लेखा-जोखा है।
नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। इतिहास की धूल फांकते उन लाखों दस्तावेजों को अब अपनी आवाज मिलने वाली है, जो सदियों से ”मोड़ी लिपि” की रहस्यमयी लिखावट में कैद थे। मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक नगरी उज्जैन स्थित कालिदास संस्कृत अकादमी में आयोजित विशेष मोड़ी लिपि प्रशिक्षण कार्यशाला का गुरुवार को सफलतापूर्वक समापन हुआ। इस समापन के साथ ही मध्यप्रदेश को ऐसे ”इतिहास-दूतों” की एक नई टोली मिली है, जो हमारी जड़ों से कटे हुए 800 साल पुराने गौरवशाली इतिहास को फिर से जीवंत करेंगे।
40 लाख अनपढ़े पन्ने और एक लिपि का ‘पुनर्जन्म’
कार्यशाला में मुख्य प्रशिक्षक और मुंबई के सुप्रसिद्ध पुराभूअभिलेख संस्थान के विशेषज्ञ डॉ. मनोज मरसकोल्हे ने महत्वपूर्ण तथ्य साझा किए। उन्होंने बताया कि भारत के विभिन्न अभिलेखागारों में आज भी लगभग 40 लाख ऐसे दस्तावेज मौजूद हैं, जिन्हें आज तक कोई पढ़ नहीं सका है। डॉ. मरसकोल्हे ने कहा “यह लिपि मात्र लिखावट नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों का राजकाज, उनकी संस्कृति और दैनिक जीवन का लेखा-जोखा है। इस कार्यशाला के समापन के साथ हमने उन बंद दरवाजों को खोलने की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ाया है।”
हेमाद्री पंत की वो ‘रहस्यमयी’ कला
कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञ अमोल मोहलकर ने बताया कि इस लिपि के जनक “हेमाद्री पंत” माने जाते हैं। इस लिपि का आविष्कार ही इसलिए किया गया था ताकि राजकीय पत्राचार और युद्ध की रणनीतियों में ”गोपनीयता” बनी रहे। मराठा काल में पूरे देश में राजकाज की मुख्य भाषा रही यह लिपि मध्यप्रदेश में भी साल 1960 तक चलन में थी। किंतु, टाइपराइटर (टंकण यंत्र) के आने के बाद यह लिपि धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में दब गई।
कालिदास संस्कृत अकादमी के निदेशक डॉ. गोविन्द गन्धे ने कार्यशाला की सफलता पर कहा कि लिपि सीखने का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि अपनी जड़ों की ओर लौटना है। उन्होंने बताया कि प्रतिदिन सुबह 8 से 10 बजे तक चले इस सत्र में प्रशिक्षु बेहद उत्साहित रहे। कार्यशाला की खास बात यह रही कि इसमें केवल छात्र ही नहीं, बल्कि शहर के प्रतिष्ठित विद्वानों और नागरिकों ने भी रुचि दिखाई।
प्रशिक्षण पूर्ण करने वालों में प्रमुख रूप से संस्कृतविद डा. सदानंद त्रिपाठी, संस्कार भारती की अध्यक्ष माया बधेका, अमित कुमार पिथाये, डा. मैत्रा रावणकर, मोनिका प्रजापत और राजश्री पाठक, गोपाल महाकाल, महेन्द्र गौरे, अनिल बारोड़ शामिल रहे। प्रतिभागियों को संकल्प दिलाया गया कि वे इस लिपि का निरंतर अभ्यास करेंगे ताकि भविष्य में शोधार्थियों को ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुवाद में मदद मिल सके।
यह कार्यशाला इस बात का प्रमाण है कि यदि सही मार्गदर्शन मिले, तो आधुनिकता के दौर में भी हम अपनी लुप्त होती विरासतों को बचा सकते हैं। अब उम्मीद है कि इन प्रशिक्षित युवाओं के माध्यम से इतिहास के वे पन्ने भी अपनी कहानी सुना पाएंगे जो अब तक खामोश थे।
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