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दीवारों पर नारे, सड़क किनारे कचरे के ढेर


नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। मध्यप्रदेश की धर्मधानी ‘उज्जैन’ स्वच्छ सर्वेक्षण के कड़े इम्तिहान से गुजर रही है। सर्वेक्षण टीम शहर के कोने-कोने को खंगाल रही है ताकि यह जांचा जा सके कि दावों में कितनी हकीकत है।

नगर निगम के आला अधिकारी अपनी पीठ थपथपाते हुए उज्जैन को स्वच्छता में नंबर-1 बनाने का दंभ भर रहे हैं, लेकिन जमीनी तस्वीरें कुछ और कहानी कह रही हैं। शहर के लोहे का पुल क्षेत्र, खंदार मोहल्ला और ढांचा भवन क्षेत्र से सामने आई तस्वीरें साफ बता रही हैं कि स्वच्छता अभी भी उज्जैन की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल है।

सवाल ये है कि जब स्वच्छता पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, पर्याप्त अमला मौजूद है और सर्वेक्षण के दौरान विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं, तब भी शहर के कई हिस्सों में गंदगी क्यों स्थायी समस्या बनी हुई है।

लोहे का पुल क्षेत्र में सड़क किनारे कचरे का ढेर जमा है। खंदार मोहल्ले में नाला प्लास्टिक और घरेलू कचरे से पटा पड़ा है। हालात ऐसे हैं कि नाले में पानी कम और कचरा ज्यादा दिखाई देता है। वहीं ढांचा भवन क्षेत्र में विडंबना और भी बड़ी है। यहां दीवारों पर स्वच्छता के संदेश लिखे गए हैं, लेकिन उन्हीं संदेशों के सामने कचरा बिखरा पड़ा है।

यह दृश्य नगर निगम के स्वच्छता अभियान और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर साफ दिखाता है। हैरानी की बात यह है कि यह स्थिति उस शहर की है जिसे धार्मिक और पर्यटन नगरी के रूप में देश-दुनिया में पहचान मिली हुई है। यह स्मार्ट सिटी मिशन का हिस्सा है, जहां वर्ष 2028 में महाकुंभ सिंहस्थ लगना है, जिसकी तैयारियों पर मध्यप्रदेश सरकार 18 हजार करोड़ रुपये के विकास कार्य करवा रही है।

इन सबके बावजूद शहर के कई हिस्सों में सफाई व्यवस्था बेहतर न होना व्यवस्था पर प्रश्न उठाती है। नागरिकों का कहना है कि महाकाल मंदिर क्षेत्र और फ्रीगंज के कुछ मार्गों को छोड़दे तो कई कालोनियों में महीनों झाड़ू तक नहीं लगती। नालियां साफ नहीं होती। डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण वाहन के अनियमित संचालन की शिकायतें भी समय-समय पर सामने आती रही हैं। नतीजा यह है कि खाली प्लाट, नाले और सड़क किनारे कचरा जमा होने लगता है।

साढ़े छह साल बाद भी अधूरा है सीवरेज प्रोजेक्ट, बायो सीएनजी प्लांट कागजों में ही बना

शहर को सीवरेज और गंदे पानी की समस्या से राहत दिलाने के लिए वर्ष 2017 में शुरू किया गया भूमिगत सीवरेज प्रोजेक्ट भी नगर निगम की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता है। यह परियोजना अनुबंधित अवधि वर्ष 2019 में पूरी हो जानी थी, लेकिन समय सीमा बीतने के साढ़े छह साल बाद भी अधूरी है। अब अधूरा काम अन्य ठेकेदार से कराने की तैयारी हो रही है।

जिस परियोजना का उद्देश्य शिप्रा नदी के जल को प्रदूषण से बचाना और सड़कों पर बहते सीवरेज को रोकना था, उसके अधूरे रहने का असर आज भी शहर भुगत रहा है। उधर ट्रेंचिंग ग्राउंड पर कचरे का पहाड़ अब भी खड़ा है। दो साल पहले स्वीकृत बायो-सीएनजी प्लांट कागजों में ही बना, धरातल पर गोंदिया गांव में स्थापित नहीं हो पाया। करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद कचरा निस्तारण की स्थायी व्यवस्था धरातल पर नहीं उतर सकी है।

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