नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। आज 1 मई को जब पूरा विश्व बुद्ध पूर्णिमा मनाने जा रहा है, बौद्ध अनुयायी धम्म वंदना के लिए वैश्य टेकरी पर जुटने जा रहे हैं, तब एक कड़वा सच सामने आता है। उज्जैन की यह धरोहर, जो ऐतिहासिक रूप से सांची से भी बड़ी और महत्वपूर्ण है, आज सरकारी फाइलों और उपेक्षा के बीच कहीं खो गई है।
इतिहासकारों के अनुसार, सम्राट अशोक ने अपनी पत्नी (महादेवी) की याद में भारत भर में 84 हजार स्तूप बनवाए थे, जिनमें उज्जैन की ‘वैश्य टेकरी’ भी शामिल है। इसका व्यास 350 फीट और ऊंचाई 100 फीट है। यह न केवल भारत बल्कि चीन, श्रीलंका, जापान और कंबोडिया जैसे देशों के श्रद्धालुओं के लिए भी गहरी आस्था का केंद्र है।
सन् 1937-38 की खोदाई में यहां ऐतिहासिक अवशेष मिले थे, जिसके बाद इसे ‘राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक’ का दर्जा तो मिला, लेकिन विकास के नाम पर कुछ नहीं हुआ। उज्जैन में ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मंदिर के नवविस्तारित क्षेत्र ‘महाकाल महालोक’ बनने के बाद पर्यटकों की बाढ़ आई हुई है और 2028 का सिंहस्थ कुंभ भी नजदीक है।
इसके बावजूद, पर्यटन विभाग के पास इस बौद्ध सर्किट के लिए कोई ठोस प्लान नहीं है। पर्यटन विकास निगम के अनुसार, टेकरी के आसपास की अधिकांश भूमि निजी स्वामित्व की है। विभाग का कहना है कि जब तक सरकार भूमि उपलब्ध नहीं कराती, तब तक कोई बड़ी कार्ययोजना बनाना मुश्किल है।
पर्यटन की अपार संभावनाएं : सिर्फ स्तूप ही नहीं, और भी बहुत कुछ है यहां
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार इस क्षेत्र को विकसित करे, तो यह अंतरराष्ट्रीय बौद्ध पर्यटन का बड़ा केंद्र बन सकता है। पास ही उंडासा तालाब है, जहां हर साल साइबेरिया से प्रवासी पक्षी आते हैं। यदि पहुंच मार्ग सुधर जाए, तो महाकाल आने वाले लाखों श्रद्धालु इस बौद्ध विरासत को भी करीब से देख सकेंगे।
शुक्रवार को बुद्ध पूर्णिमा पर जब हजारों लोग यहां शांति और प्रार्थना के लिए एकत्रित होंगे, तब सवाल यही उठता है कि क्या 2300 साल पुरानी इस विरासत को केवल एक ‘संरक्षित स्मारक’ का बोर्ड लगाकर छोड़ देना काफी है। उज्जैन को धार्मिक पर्यटन का ग्लोबल हब बनाने का सपना तब तक अधूरा है, जब तक ‘वैश्य टेकरी’ को उसका खोया हुआ गौरव नहीं मिल जाता।

