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उज्जैन में सांची से भी बड़े बौद्ध स्तूप की 90 साल बाद फिर शुरू होगी खोदाई; खुलेगा 2200 साल पुराना रहस्य


नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन । मध्य प्रदेश सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) मिलकर उज्जैन स्थित ‘वैश्य टेकरी’ के विशाल बौद्ध स्तूप की नए सिरे से खोदाई कराने की तैयारी कर रहे हैं।

उज्जैन के वैश्य टेकरी में स्थित इस विशाल टीले की 1938-39 में ब्रिटिश शासन के दौरान इस स्तूप की आंशिक खोदाई की गई, लेकिन इस दौरान जहरीली गैस का रिसाव होने से मजदूरों के बेहोश होने के कारण इसका काम रोक दिया गया था। अब दोबारा इसकी खोदाई की जाएगी, तो पुराने रहस्य सामने आने की संभावना है। साथ ही प्राचीन इतिहास भी सामने आ सकेगा।

अब लगभग 90 साल बाद, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस परियोजना को आगे बढ़ाने का जिम्मा उठाया है। मध्य प्रदेश सरकार एएसआई के साथ मिलकर नए सिरे से स्तूप की खोदाई करवाने की तैयारी में है। जहां मौर्य सम्राट अशोक के काल का करीब 2,200 साल पुराने प्राचीन बौद्ध स्तूप दबे होने की संभावना है। यह स्तूप सांची से भी बड़ा बताया जाता है।

सांची से भी विशाल स्तूप

ब्रिटिश काल की पुरातात्विक रिपोर्ट के अनुसार, उज्जैन स्थित इस स्तूप का व्यास 350 फीट और ऊंचाई कम से कम 100 फीट दर्ज की गई थी। यह सांची के 120 फीट व्यास और 54 फीट ऊंचाई वाले स्तूप से कहीं अधिक है।

रिपोर्ट में इस संरचना को लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व यानी मौर्य काल का बताया गया है, इससे इसकी उम्र करीब 22,00 वर्ष हो रही है। इसे सांची से लगभग 236 किलोमीटर पश्चिम में स्थित ‘वैश्य टेकरी’ को रिपोर्ट में एक आयताकार खाई से घिरे विशाल गोलाकार टीले के रूप में दर्शाया गया है।

यहां हुई आंशिक खुदाई के दौरान मुख्य स्तूप के साथ-साथ दो छोटे स्तूपों के अवशेष भी मिले थे। इसे वास्तुशिल्प का एक ‘विलक्षण निर्माण’ माना गया है, जिसकी स्थापत्य कला अन्यत्र देखने को नहीं मिलती।

सम्राट अशोक से है इसका संबंध

विशेषज्ञों और पुरातात्विक रिपोर्ट के अनुसार, इस स्तूप का सीधा संबंध सम्राट अशोक से हो सकता है। हालांकि, इसका कोई अंतिम या निर्णायक प्रमाण नहीं मिला है, लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीक्षक पुरातत्वविद् शिवकांत बाजपेयी के अनुसार, कुछ प्राचीन अभिलेख और ऐतिहासिक साक्ष्य इस स्मारक को सम्राट अशोक के शासनकाल से जोड़ते हैं।

तब अशोक उज्जैन के गवर्नर थे

ऐसा कहा जाता है कि जब अशोक उज्जैन के गवर्नर थे, तब उन्होंने अपनी पत्नी (जो विदिशा के नगरश्रेष्ठी की पुत्री थीं) की प्रेरणा से इस स्तूप का निर्माण करवाया था। इसलिए एक वैश्य (बनिया) की पुत्री की प्रेरणा से स्थापित यह बौद्ध स्थल वैश्य टेकरी के नाम से जाना जाने लगा।

लेकिन प्राचीन बौद्ध साहित्य में वैश्य टेकरी को कनकगिरि विहार से भी जोड़ा गया है और संभवतः चीनी यात्री ह्वेन त्सांग द्वारा वर्णित एक विशाल स्तूप से भी, हालांकि दोनों ही अप्रमाणित हैं और इसकी आधिकारिक पुष्टि बाकी है।

स्तूप का अंदरूनी हिस्सा स्थानीय मुरुम से तैयार किया गया था

शिवकांत बाजपेयी के अनुसार, 1939 में हुई खुदाई के दौरान यह पाया गया कि स्तूप का अंदरूनी हिस्सा (कोर) स्थानीय मुरुम से तैयार किया गया था। वहीं, इसकी बाहरी परत को मजबूत बनाने के लिए मिट्टी के गारे में बड़ी ईंटों की चिनाई की गई थी, ताकि बाहरी दबाव को संतुलित किया जा सके।

हालांकि, समय के साथ बारिश व प्राकृतिक कारणों से ईंटों की बाहरी परत का अधिकांश हिस्सा नष्ट हो चुका था। इस वजह से स्तूप की मूल संरचना, नक्शा और सटीक ऊंचाई पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सकी।

गौरतलब है कि 1939 में रुका यह ऐतिहासिक कार्य अब लगभग नौ दशकों (90 वर्ष) के लंबे इंतजार के बाद उज्जैन स्थित वैश्य टेकरी में एक बार फिर शुरू होने जा रहा है।

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