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उज्जैन में ‘समय’ पर मंथन, अब देश ने पकड़ी ‘एक समय’ की राह


धीरज गोमे, नईदुनिया, उज्जैन। महाकाल की नगरी उज्जैन में इसी वर्ष अप्रैल में समय को भारतीय संदर्भ में फिर से समझने और कालगणना की प्राचीन परंपरा को आधुनिक विज्ञान से जोड़ने का विमर्श हुआ था। ‘महाकाल : द मास्टर ऑफ टाइम’ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने ‘महाकाल स्टैंडर्ड टाइम’ की अवधारणा को चर्चा के केंद्र में रखा था।

अब केंद्र सरकार ने देश की समय व्यवस्था को अधिक सटीक, प्रमाणित और एकरूप बनाने की दिशा में नई कवायद शुरू की है। केंद्र ने लीगल मेट्रोलाजी (इंडियन स्टैंडर्ड टाइम) रूल्स-2026 अधिसूचित किए हैं। इनके तहत भारतीय मानक समय (आइएसटी) को कानूनी, प्रशासनिक, व्यावसायिक और अन्य आधिकारिक कार्यों के लिए साझा समय-संदर्भ बनाने का ढांचा तैयार किया गया है।

नियम 27 अगस्त को अधिसूचित हुए हैं और राजपत्र में प्रकाशन के 180 दिन बाद प्रभावी होंगे। उज्जैन में समय की भारतीय अवधारणा और उसकी वैज्ञानिक परंपरा पर राष्ट्रीय स्तर का विमर्श हुआ। इसके कुछ ही महीनों बाद देश के डिजिटल ढांचे में प्रमाणित भारतीय समय की भूमिका मजबूत करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। समय को भारतीय वैज्ञानिक संदर्भ से जोड़ने वाली व्यापक सोच में दोनों घटनाओं का संबंध दिखाई देता है।

उज्जैन की कालगणना परंपरा सूर्य की गति और खगोलीय गणनाओं की वैज्ञानिक समझ पर आधारित रही है

उज्जैन की कालगणना परंपरा सूर्य की गति और खगोलीय गणनाओं की वैज्ञानिक समझ पर आधारित रही है। आज प्रमाणित आइएसटी के जरिए डिजिटल प्रणालियों में समय का एकरूप संदर्भ बनना, इसी वैज्ञानिक दृष्टि की आधुनिक तकनीकी अभिव्यक्ति कहा जा सकता है। – डा. राजेंद्र प्रकाश गुप्त, अधीक्षक एवं खगोलविद, जीवाजी वेधशाला, उज्जैन

तब उज्जैन में ऐसे पढ़ा जाता था समय?

  • उज्जैन प्राचीन भारतीय खगोलीय परंपरा का प्रमुख केंद्र रहा है। सूर्य की स्थिति, उसकी छाया और खगोलीय पिंडों की गति के आधार पर समय व अन्य गणनाएं की जाती थीं।
  • जीवाजी वेधशाला के नाड़ीवलय, धूपघड़ी और दिगंश जैसे यंत्र इसी परंपरा के उदाहरण हैं। धूपघड़ी में सूर्य की छाया से समय का अनुमान लगाया जाता था।
  • सूर्यसिद्धांत की परंपरा में अवंति यानी उज्जैन का कालगणना और देशांतर गणना से विशेष संबंध माना गया है।

समय का सफर

  • तब : स्थानीय सूर्य की स्थिति – स्थानीय समय
  • फिर : साझा मानक की जरूरत – आइएसटी
  • अब : प्रमाणित आइएसटी – डिजिटल प्रणालियों का सटीक तालमेल

प्रश्न : अब सरकार क्या करने जा रही है?

जवाब : बदलाव घड़ी की सुइयों का नहीं है। आईएसटी भी नहीं बदलेगा। नई व्यवस्था का उद्देश्य बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, दूरसंचार, परिवहन, बिजली और अन्य महत्वपूर्ण प्रणालियों में समय के प्रमाणित और एक समान संदर्भ को मजबूत करना है।

प्रश्न : क्या मुझे अपनी घड़ी मिलानी पड़ेगी?

जवाब : नहीं। कलाई घड़ी, दीवार घड़ी और मोबाइल पहले की तरह ही चलेंगे। आम नागरिक को अलग से कुछ नहीं करना है।

एक घटना, दो घड़ियां… तो कहां फंस सकती है बात?

10:00:00 – बैंक सर्वर में भुगतान दर्ज

09:59:59 – दूसरे सिस्टम में पुष्टि दर्ज

अब सवाल – पहले भुगतान हुआ या पुष्टि?

अलग-अलग सिस्टम की घड़ियों में अंतर होने पर घटनाओं का सही क्रम तय करना कठिन हो सकता है। डिजिटल दुनिया में हर लेनदेन और गतिविधि के साथ दर्ज होने वाला टाइम-स्टैंप इसलिए महत्वपूर्ण है।

आपको असर कहां दिख सकता है?

  • बैंकिंग व यूपीआई : लेनदेन के समय का अधिक सटीक रिकार्ड।
  • मोबाइल नेटवर्क : उपकरणों और सिस्टम में बेहतर समय-तालमेल।
  • रेलवे व परिवहन : डिजिटल प्रणालियों के बीच बेहतर समन्वय।
  • बिजली व्यवस्था : गड़बड़ी के दौरान घटनाओं का सही क्रम समझने में मदद।
  • साइबर जांच : अलग-अलग सर्वर की घटनाओं की श्रृंखला जोड़ना आसान।

(हर जगह एक सेकंड का अंतर गंभीर नहीं होता, लेकिन कुछ प्रणालियों में मिली सेकंड तक का फर्क भी महत्वपूर्ण हो सकता है।)

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