उज्जैन के ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मंदिर और आसपास के देवालयों का 7.41 करोड़ रुपये से संरक्षण एवं जीर्णोद्धार किया जाएगा। …और पढ़ें

HighLights
- जीर्णोद्धार सीबीआरआई की गाइडलाइन पर होगा स्ट्रक्चरल रिपेयर
- बेसाल्ट पत्थर से बनेगा वाटरप्रूफ ड्रेनेज, काई हटाने को हींग के घोल का उपयोग
- सीएफआरपी तकनीक से मजबूत होंगे बीम-खंभे चूना-सुर्खी से होगी ग्राउटिंग
नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मंदिर और उसके आसपास स्थित मंदिरों का 7 करोड़ 41 लाख रुपये से संरक्षण एवं जीर्णोद्धार होने जा रहा है। सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीबीआरआई) के तकनीकी दिशा-निर्देशों के आधार पर मंदिरों के ‘स्ट्रक्चरल रिपेयर एवं रिहैबिलिटेशन’ कार्य के लिए ठेकेदार चयन की प्रक्रिया शुरू की गई है।
अफसरों का कहना है कि मंदिर परिसर की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से यह परियोजना तैयार की गई है। लंबे समय से मौसम के प्रभाव, जल रिसाव और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की आवाजाही के कारण मंदिर संरचनाओं में दरारें, पत्थरों के जोड़ों का कमजोर होना और सीमेंट पैच जैसी समस्याएं सामने आ रही थीं।
जल निकासी व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाएगा
अब वैज्ञानिक पद्धति से इनका संरक्षण किया जाएगा, ताकि मंदिर की मूल वास्तुकला और मजबूती लंबे समय तक सुरक्षित रह सके। परियोजना के तहत गर्भगृह और अन्य हिस्सों से निकलने वाले अभिषेक जल के लिए आधुनिक एवं वाटरप्रूफ ड्रेनेज सिस्टम तैयार किया जाएगा। इसके लिए बेसाल्ट पत्थरों का उपयोग होगा, वहीं बाहरी जल निकासी व्यवस्था को भी सुदृढ़ किया जाएगा।
पत्थरों पर जमी काई और वनस्पतियों की सफाई के लिए रासायनिक पदार्थों के बजाय 0.25 से 0.30 प्रतिशत हींग के आर्गेनिक घोल और नायलान ब्रश का उपयोग किया जाएगा। यह प्रक्रिया मंदिर की प्राचीन संरचना को नुकसान पहुंचाए बिना सफाई सुनिश्चित करेगी। कोटि सरोवर कुंड, मंदिर की छतों और आरसीसी दीवारों में हो रहे रिसाव को रोकने के लिए पॉलीमर मॉडिफाइड सीमेंट कोटिंग, पीयू फोम इंजेक्शन और इलास्टोमेरिक एक्रिलिक मेंब्रेन तकनीक से वाटरप्रूफिंग की जाएगी।
पुराने और खराब सीमेंट पैच हटाकर दरारों में चूना, सुर्खी और रेत के पारंपरिक मिश्रण से री-पॉइंटिंग एवं ग्राउटिंग की जाएगी। वहीं कमजोर बीम और खंभों को मजबूती देने के लिए आधुनिक सीएफआरपी (कार्बन फाइबर रीइन्फोर्सड पालीमर) तकनीक का इस्तेमाल होगा।
12 से 18 महीनों में पूरा करने का लक्ष्य
कार्य के दौरान पूरे मंदिर परिसर में मजबूत ट्यूबलर स्टील स्कैफल्डिंग लगाई जाएगी, जिससे ऊंचाई वाले हिस्सों में सुरक्षित तरीके से मरम्मत की जा सके। क्षतिग्रस्त पत्थरों को हटाकर उनकी जगह नए तराशे हुए बेसाल्ट पत्थर लगाए जाएंगे, ताकि मंदिर का मूल स्वरूप बरकरार रहे। यह संपूर्ण कार्य इंजीनियरों और पुरातत्व विशेषज्ञों की निगरानी में किया जाएगा।
चूना और सुर्खी आधारित पारंपरिक क्युरिंग प्रक्रिया के कारण विभिन्न चरणों में 7 से 14 दिनों का समय लगेगा। प्रशासन ने पूरी परियोजना को अगले 12 से 18 महीनों में पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया है, जबकि दर्शन व्यवस्था को प्रभावित न करने के लिए कार्य चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा।